ॐ मन्त्र एक महाशक्ति और दिव्य शक्ति है...☆☆

 आज के इस लेख में आपको ओम नाम का जाप और उसकी विधि विधान के बारे में बता रही हूं। ओम भगवान शिव का रूप है और शिव ही ओम है ।जिसने भी ओम नाम का जाप किया उसका उसकी नैया पार हुई ।ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा गया है ओम से बड़ा ना कोई  ना कोई  मंतर है ना जाप है यह पुरे ब्रह्मांड का सार है।
ओम नाम यह एक मूल मंत्र है,जो हमारी धमनियों से बना है, यह ब्रह्मा सृष्टि को उत्पन्न करने वाला औ शब्द विष्णु भगवान पालन करने वाला और म, रुद्र शंकर- सहांर करने वाला।
ॐ साक्षात ब्रह्मा माना गया है। यह ब्रह्मा का सर्वश्रेष्ठ रूप है। समस्त वैदिक धर्म में ओम को प्रभु के उतम से मान्यता प्राप्त है। बौद्ध धर्म में, जैन धर्म में, शांत संप्रदाय में भी उनकी मान्यता है। सब संप्रदाय मंत्रों में भी ओम का प्रथम उच्चारण विहत है। ओम नाम का जाप दुख का विनाश करता है।
 ओम हिंदू धर्म में पूजनीय है, इस ओम को सर्वशक्तिमान मानते हुए ओम को विधिवत उच्चारण करने मात्र से प्राणों की उज्जवल भविष्य में होने लगती है। ओम का ध्यान लगाने से मन को शांत, मन को केंद्रित करने के लिए बहुत उपयोगी और सर्वशक्तिमान उपाय हैं और ॐ के हजारों अर्थ हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है जो भगवत वाक्य है, वह प्रमाण है, सत्य है, यह भगवान श्री कृष्ण का कथन है, कि जो पुरूष ॐ के इस अक्षर का ब्रह्मा का उच्चारण करते हुए मुझे स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है वह परम गति को प्राप्त होता है।
 ओम यह अक्सर ही सब कुछ है प्रणब ही है, अपर ब्रह्मा है, और प्रणव ही पर ब्रह्मा है। यह अपूर्वानंद और सत्य अर्थात इससे पहले पीछे और कुछ भी नहीं है।और उसका कोई कार्य भी नहीं है, वह यह है नित्य प्रणव सबका आदि मध्य और अंत है। प्रणब का ऐसा जानकर फिर उसी को प्राप्त हो जाता है। प्रणब ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर समझे सर्वव्यापी ओंकार को जान लेने पर धीर पुरूष शोक करता। जिसने मात्राहीन और अनंन्त मात्राओ वाले दैत शुन्य  कल्याण स्वरूप उसे वही प्राप्त हो जाती है। ओमितींद सवर्म ॐ ही बस यही ब्रह्मा है।और यही सब कुछ है इससे ऊपर  पूरे ब्रह्मांड मे कुछ नही है।
ॐ तत्सर्वं के संपूर्ण वाणी का पता है ,वह सब कुछ जानता है। ओमकार को जानने वाला जिस वस्तु की ईच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाती है। हम सबके लिए यही ब्रह्म है। इसका मानसिक जाप शांति, रोमांचकारी, आनंद और मानसिक अवस्था उत्कृष्ट विचार बहुत जल्द देता है। आप इसे कर देखें ध्यान आसन में बैठकर तीन बार लंबी सांस नाक से खींचकर मन इंद्रियों को किसी प्रकार के विचारों से हटा दीजिए रीड की हड्डी को सीधा करके बैठ जाएं,और दोनों भृकटियो के मध्य आज्ञा चक्र पर केंद्रित करके ओम का जप आराम कीजिए। कोशिश करें शुरू मे 5 मिनट से शुरू करके एक से 2 घंटे तक जाप करते रहने की कोशिश कीजिए ।जो अदृश्य शक्ति आपको इससे प्राप्त होगी ।उसकी कोई लेख में भी नहीं लिख सकता। मन दो होते हैं जब हम ध्यान या जब या पूजा करते हैं पहला मन हमारे पास होता है और दो दूसरा मन ही अलग विषय में अंदर तक दौड़ लगाना शुरू कर देता है। वह बिन बात के भागता रहता है, रोकिए उसे दूसरे को दोनों मनों को पूर्ण रूप से ओम का जाप में लगा दीजिए। आप अपने दोनों मनो को एक साथ इकट्ठा नहीं कर सकते तो पहले मन को ओम नाम के मानसिक जाप में पूर्ण ध्यान सहित लगा दीजिए, और दूसरे मन से यह सोचना शुरु कर दें कि एक विशाल पर्वत है जिस की चोटियां बहुत सुंदर जैसी बर्फ से ढकी हुई है, वहां पर एक सुंदर मन लुभवाना मंदिर भी बना हुआ है। उस मंदिर तक पहुंचने के लिए  बहुत सीढियां बनी हुई है। और प्रत्येक ओम नाम के मानसिक जाप के साथ एक-एक सीढ़ी कर रहा हूं, मंदिर तक पहुंचने वाला हूं।औम एक तारक मंत्र है। ॐ का प्रथम अक्षर अकार है, और दूसरा उकार है ,तीसरा अक्षर मैकार है, चौथा अक्षर अर्धमात्रा है, पांचवा अक्षर अनुस्वा है ,और छठा अक्षर नाद है। यह तारक मंत्र भगवान शिव काशी धाम  में मरने वालों के कान में गुप्त रूप से फुकते हैं, जिससे कि वाणी  सदद्मोक्ष को  प्राप्त हो जाता है।

 जिसने भी ओम नाम का जाप तन मन, धन और विधि विधान से किया उसने स्वयं भगवान शिव के दर्शन किए हैं ।इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है ओम शिव का ही रूप है। और शिव ही औम है यहीं सत्य है। मन को टीकाना इतना आसान नहीं होता है। जिस प्रकार से हम छोटे बच्चे को स्कूल में छोड़ देते हैं और उसको पता होता कि बस  सकुल में ही कैद रहना है, इसी प्रकार हमें अपने मन को मंत्र जाप करो तो उसके लिए मन को छोटे बच्चे की तरह ही जबरदस्ती ध्यान और पूजा में लगाना पड़ता है। और जब मन लग जाता है तो सब कुछ बहुत आसानी से मिल जाता है ।जिस व्यक्ति ने उनकी साधना कर ली उसे किसी और के पास जाने  की जरूरत नहीं है ।ओम सर्वशकितमान,सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़ा महा मंत्र दिव्य मन्त्र है। 

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