प्राणायम और योग करने के लाभ और सावधानियां

रोगोपचार की दृष्टि से उपयोगी व अन्य प्राणायाम 👇🏻 1.सूर्यभेदी या सूर्याग प्राणायाम : - 

ध्यानासन में बैठकर दाई नासिका से पूरक करके तत्पश्चात् कुम्भक जालन्धर व मूलबन्ध के साथ करें और अन्त में बाई नासिका से रेचक करें और कुम्भक का समय धीरे - धीरे बढ़ाते जाना चाहिए, इस प्राणायाम की आवृत्ति 3 से10 मीनट तक बढ़ाइये। कुम्भक के समय सूर्यमण्डल का तेज के साथ ध्यान करना चाहिए और ग्रीष्म ऋतु में इस प्राणायाम को अल्प मात्रा में करना चाहिए।
लाभ : - शरीर में उष्णता की वृद्धि होती है, वात व कफ से उत्पन्न होने वाले रोग , रक्त व त्वचा के दोष , उदर - कृमि , कोद , सुजाक , छूत के रोग , अजीर्ण , अपच , स्त्री - रोग आदि में लाभदायक है।
कुण्डलिनी जागरण में सहायक है । बुढ़ापा दूर रहता है,बिना कुम्भक के सूर्य भेदी प्राणायाम करने में हृदय गति और शरीर की कार्यशीलता बढ़ती है तथा वजन कम होता है।


2. चन्द्रभेदी या चन्द्रांग प्राणायाम :
इस प्राणायाम में बाई नासिका पूरक करके अन्तः कुम्भक करे और इसे जालनधर या मूल बन्ध के साथ करना उत्तम है। तत्पश्चात् दाई नाक से रचेक करें। इसमें हमेशा चन्द्रस्वर से पूरक व सूर्यसवर से रेचक करते है औ, सूर्यमेदी इससे ठीक विपरीत है । कुम्भक के समय पूर्ण चन्द्रमण्डल के प्रकाश के साथ ध्यान करें ,शीतकाल में इसका अभ्यास कम करना चाहिए।

लाभ : - शरीर में शीतलता आकर थकावट व उष्णता दूर होती है, मन की उतेजनाओं को शान्त करता है । पित्त से होने वाली जलन में लाभदायक है ।

3. उज्जायी प्राणायाम : - 


इस प्राणायाम में पूरक करते हुये गले को सिकोड़ते हैं और जब गले को सिकोड़कर श्वास अन्दर भरते हैं तब जैसे खर्राटे लेते समय गले से आवाज होती है , वैसे ही इसमें पूरक करते हुए कण्ठ से ध्वनि होती है । हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिए । प्रारम्भ में कुम्भक का प्रयोग न करके पूरक - रेचक का ही अभ्यास करना चाहिए । पूरक के बाद धीरे - धीरे कुम्मक का समय पूरक जितना तथा कुछ दिनों के अभ्यास के बाद कुम्भक का समय पूरक से दुगुना कर दीजिए । कुम्मक 10 सेकेण्ड से ज्यादा से ज्यादा करना हो तो जालन्धर बन्ध व मूलबन्ध भी लगाइए। इस प्राणायाम में सदैव दाई नासिका को बन्द करके बाई नासिका से ही रेचक करना चाहिए।

लाभ : - जो साल भर सर्दी , खाँसी , जुकाम से पीड़ित रहते हैं , जिनको टॉन्सिल , थाइरॉइड ग्लैंड , अनिद्रा , मानसिक तनाव व रक्तचाप ,अजीर्ण आमवात ,जलोदर ,क्षय , ज्वर , प्लीहा आदि रोग हों उनके लिये यह लाभदायक है। गले को निरोगी व मधुर बनाने हेतु नियमित अभ्यास करना चाहिए और कुण्डलिनी जागरण , अजपा - जाप ध्यान आदि के लिए उत्तम है इस से बच्चों का तुतलाना भी ठीक हो जाता है ।

4. कर्ण रोगान्तक प्राणायाम : -

इस प्राणायाम में दोनों नासिकाओं से पूरक करके फिर मुँह व दोनों नासिकाएँ बन्द कर पूरक की हुई हवा को बाहर धक्का देते हैं , जैसे कि श्वास को कानों से बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है । 4या 5 बार श्वास को ऊपर की ओर धक्का देकर फिर दोनों नासिकाओं से रेचक करें । इस प्रकार 2-3 बार करना पर्याप्त होगा।

लाभ : - कर्ण रोगों तथा बहरापन में लाभदायक है ।

5. शीतली प्राणायाम : -

ध्यानात्मक आसन में बैठकर हाथ घुटनों पर रखें, जिभ को नालीनुमा मोड़कर मुँह खुला रखते हुए मुँह से पूरक करें ।जिभ से धीरे - धीरे श्वास लेकर फेफड़ों को पूरा भरें। कुछ क्षण रोककर मुँह का बन्द करके दोनों नासिकाओं से रेचक करें । तत्पश्चात् पुनः जिभ को मोड़कर मुँह से पूरक ब नाक से रेचक करें । इस तरह 8 से 10 बार करें। और शीतकाल में इसका अभ्यास कम करें ।
विशेष : -
कुम्भक के साथ जालन्धर बन्ध भी लगा सकते हैं, कफ प्रकृतिवालों एवं टॉन्सिल के रोगियों को शीतली व सीत्कारी प्राणायाम नहीं करना
चाहिए।

लाभ : - जिह्वा, मुँह व गले के रोगों में लाभप्रद है,गुल्म , प्लीहा , ज्वर , अजीर्ण आदि ठीक होते हैं और उच्च रक्तचाप को कम करता है। पित्त के रोगों में लाभप्रद है। रक्तशोधन भी करता है।

6.सीत्कारी प्राणायाम : -

ध्यानात्मक आसन में बैठकर जिभ को ऊपर तालु में लगाकर ऊपर - नीचे की दन्त पंक्ति को एकदम सटाकर ओठों को खोलकर रखें । अब धीरे - धीरे ' सी - सी की आवाज करते हुए मुँह से श्वास लें और फेफड़ों को पूरी तरह भर लें।

जालन्धर - बन्ध लगाकर जितनी देर आराम से रुक सके तो रुकें। फिर मुँह बन्द कर नाक से धीरे - धीरे रेचक करें । पुनः इसी तरह दुहरायें । 8-10 बार का अभ्यास पर्याप्त है । शीतकाल में इस आसन का अभ्यास कम करना चाहिए।

विशेष : - बिना कुम्भक व जालन्धर बन्ध के भी अभ्यास कर सकते हैं । पूरक के समय दाँत एवं जिला अपने स्थान पर स्थिर रहनी चाहिए ।

लाभ : गुण - धर्म व लाभ शीतली प्राणायाम की तरह हैं। दन्त रोग, पायरिया आदि गले , मुँह , नाक , जिह्वा के रोग दूर होते हैं । निद्रा कम होती है और शरीर शीतल रहता है । उच्च रक्तचाप में 50 से 60 तक करने से लाभ होता है।

7. मूर्छा प्राणायाम : - 

इस प्राणायाम में दोनों नासिकाओं से पूरक आँखें बन्द करके करते हुए सिर को ऊपर उठाकर पीछे ले जाते हैं , ताकि दृष्टि आकाश की ओर रहे ।फिर अन्त मे कुम्भक लगाते हैं। बाद में आँखें खोलकर आकाश की ओर देखते हैं और अन्त मे कुम्भक के बाद आँख बन्द कर सिर को पहले की अवस्था में लाकर धीरे - धीरे रेचक करते हैं।
फिर विश्राम लिए बिना पूरक , आकाश दृष्टि ,कुम्भक सब एक साथ करते हैं और पूर्व अवस्था में आ जाते हैं प्रतिदिन 5 बार करना पर्याप्त है।

लाभ : - सिर दर्द , अर्दकपारी , यात कम्प , स्नायु दुर्बलता आदि में लाभदायक है ,नेत्र ज्योति बढ़ाने तथा स्मरण शक्ति बढाने में उपयोगी है और कुण्डलिनी जागृत करने तथा मन को अन्तर्मुखी कर ध्यान में सहयोग करता है ।

8. प्लाविनी प्राणायाम : -

यह एक प्रकार से वायु धोति है । जैसे मुँह से जल पिया जाता है , वैसे ही वायु को जब तक पेट पूरा वायु से न भर जाये लगातार पीते हैं फिर इस प्रकार डकार लेते हैं कि पी हुई सारी वायु तत्काल पेट से बाहर आ जावे । वायु पीकर दूषित वायु को मुँह से बाहर निकाला जाता है ।

लाभ : -

उदर के समस्त रोग व हिस्टीरिया दूर करने में सहायक है । कृमि का नाश होता है तथा जठराग्नि तेज होती है । दूषित वायु दूर होती है।

9. केवली प्राणायाम : - 

इसमें केवल पूरक - रेचक करते हैं, कुम्भक नहीं किया जाता तथा पूरक के साथ ओ ' शब्द का तथा रेचक के साथ ' म् ' शब्द का मानसिक उच्चारण करते हैं इस तरह श्वसन - प्रश्वसन के साथ - ओ ३ म् ' का उद्गीथ के रूप में मानसिक अजपा - जाप निरन्तर होता रहता है।

लाभ : -
एकाग्रता शीय प्राप्त होती है तथा अजपा - जप सिद्ध होता है।

10. जलन्धर बन्ध :-
पद्मासन या सिद्धासन में सीधे बैठकर श्वास को अन्दर भर लीजिए ।दोनों हाथ घुटनों पर टिके हुए हों अब ठोडी को थोड़ा नीचे झुकाते हुए कंठकूप में लगाना जालन्धर बन्ध कहलाता है। दृष्टि को भूमध्य में स्थित कीजिए। छाती आगे की ओर तनी हुई होगी।

लाभ : - .
कण्ठ के संकोच द्वारा इड़ा ,पिंगला नाड़ियों के बन्द होने पर प्राण का सुषुम्णा में प्रवेश होता है और गले के सभी रोगों में लाभदायक है ।
थायराइड ,टांसिल आदि रोगों में अभ्यसनीय है।

11.उड्डीयान बन्ध :

श्वास बाहर निकालकर पेट ढीला छोडिए और जालन्धर बन्ध लगाते हुए छाती को थोड़ा ऊपर की ओर उठाइए । पेट को कमर से लगा दीजिए । यथाशक्ति करने के पश्चात् पुनः श्वास लेकर पूर्ववत् दोहराइए । प्रारम्भ में तीन बार करना पर्याप्त
है, धीरे - धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए।

लाभ : -
पेट सम्बन्धी समस्त रोगों को दूर करता है और प्राणों को जागृत कर मणिपुर चक्र का शोधन करता है।

12. मूलबन्ध :-
सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर बाह्य या आम्यन्तर कुम्मक करते हुए , गुदामाग एवं मूत्रेन्द्रिय को ऊपर की ओर आकर्षित करें, इस बन्ध में नाभि के
नीचे वाला हिस्सा खिच जायेगा । यह बन्ध बाह्यकुम्भक के साथ लगाने में सुविधा रहती है।

लाभ : -
यह बंध मूलाधार चक्र की जागृति कर कुण्डलिनी जागरण में अत्यन्त सहायक है और कोष्ठबद्धता और बवासीर को दूर करने तथा जठराग्नि को तेज करने के लिये यह बन्ध अति उत्तम है ।

13.महाबन्ध : 

पद्मासन आदि किसी भी एक ध्यानात्मक आसन में बैठकर तीनों बन्धों को एक साथ लगाना महाबन्ध कहलाता है, इससे वे सभी लाभ मिल जाते हैं , जो पूर्व निर्दिष्ट हैं कुम्मक में ये तीनों बन्ध लगते हैं ।

शिथिलीकरण : -
प्रतिदिन शिथिलीकरण क्रियाओं का अभ्यास करें यह शरीर के हर अंग को धीरे - धीरे ढीला करते जाएं । सामान्य श्वास - प्रश्वास पर मन को एकाग्र कीजिए।इस समय कुछ भी विचार नहीं करना है। इसके बाद मन में विचार करें कि हमारा पाचन संस्थान बहुत सशक्त हो रहा है और मन तनावमुक्त हो रहा है।
मन द्वंद्वों से रहित हो रहा है' इसके बाद 15 गहरी सांस लेकर उठे।
सब समय शान्त रहने के लिये , क्रोध को कम करने के लिए श्वास धीरे - धीरे 1 मिनट में सिर्फ 4 या 5 लेना शुरू कर दें ऐसी करने से आपकी उम्र भी बढ़ जायेगी ।विश्व के समस्त प्राणियों में जो जीव जितनी कम श्वाँस लेता है वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रहता है।
अंतिम प्राणायम अभ्यास  :-
प्राणायाम करने के बाद परम आनन्द का रसपान करें जिभ को उलट कर तालुये से लगायें और भौंहों के बीच में दृष्टि को स्थिर करें और तालु से टूपकने वाले रस को पीयें, यह अमृत समान है।
इस मुद्रा में जो तालु का रस हो रहा है, इस रस को पीने वाला सदा जवान बना रहता है उसके सुख सौभाग्य में असाधारण वृद्धि होती है । इस मुद्रा को करने से साधक छः माह में समस्त रोगों से मुक्त होकर सुन्दर , स्वस्थ व बलवान बन जाता है।

भोजन : - सादा , पोषक , सुपाच्य तथा संतुलित भोजन करें गरिष्ठ , तीक्ष्ण एवं मसालेदार भोजन , मिठाइयां  केक और मैदे से बनी वस्तुओं से परहेज करें। जो और चने के आटे का उपयोग करें साथ ही धूम्रपान , गुटके तथा तंबाकू आदि का त्याग करें । उपवास , बदहजमी से मुक्ति का सबसे अच्छा उपाय है । जो लोग तेज बदहजमी के शिकार हैं , उन्हें हफ्ते में एक दिन उपवास करना चाहिए और नींबू पानी या सब्जी के सूप का उपयोग करें । उपवास के दिन कोई ठोस पदार्थ ना लें।

आज के इस टॉपिक में प्राणायाम और अन्य रोगों को ध्यान में रखते हुए हर तरह का प्राणायाम और योग की विधि बताई है। इस तरह से योग करने से आप अपने जीवन को स्वस्थ और निर्मल बना सकते हैं। योग अपने आप में ही एक डॉक्टर का काम करता है। बस जरूरत है थोड़े से नियम और ध्यान की कुछ बीमारियों को हम योग और प्राणायाम द्वारा ठीक कर सकते हैं। 
अपने लिए कम से कम 20 मिनट जरूर निकालें स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, अगर स्वास्थ्य सही है तो दुनिया में हर चीज अच्छी लगती है अगर स्वास्थ्य सही नहीं है तो दुनिया के हीरे मोती भी अच्छे नहीं लग सकते।अगर आपको यह लेख अच्छा लगे तो अपने दोस्तों और social media पर जरूर शेयर करें।

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