नवरात्रि पुजा की सम्पुर्ण विधि और दुर्गा शप्तशति का पाठ कैसे करे।

नवरात्रि के नौ दिनों में देवी शक्ति के अलग अलग रूपों की भकतगण उपासना और पुजा आरती के साथ करते हैं। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इन दिनों व्रत रखने का काफी महत्व माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों में मां दुर्गा धरती पर निवास करने आती है और जो लोग मां दुर्गा की पूजा तन ,मन, धन और भाव से करते हैं ,उन पर मां दुर्गा अपनी विशेष कृपा बरसाती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मां दुर्गा किसी दिखावे की नहीं बल्कि भाव की भूखी है। लेकिन नवरात्रि में कुछ ऐसे विधि विधान है हमारे शास्त्रों के अनुसार जो मां दुर्गा के लिए इन दिनों में करने बहुत जरूरी हैं। आइए जानते हैं किस प्रकार मां दुर्गा की संपूर्ण विधि के साथ पूजा करनी चाहिए

 नवरात्रि पुजा, व्रत-उपवास और माता की पूजा कैसे करे  :- 

नवरात्रि के दौरान इन बातों का रखें खास ध्यान। 17 अक्तूबर 2020 नवरात्रि शुरू हो रहे है। इन 9 दिनों में मां की पूजा, व्रत और उपवास किए जाने का विशेष महत्व है ,लेकिन आपको इस दौरान कुछ जरुरी बातों का ध्यान रखना चाहिए। मार्कंडेय और देवी पुराण के अनुसार देवी पूजा और व्रत-उपवास नियम के अनुसार ही करने चाहिए वरना इनका फल नहीं मिल पाता है। शाश्त्रो के अनुसार इन नौ दिनों में पूरे संयम से रहना चाहिए और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। ऐसा करने से आध्यात्मिक और शारीरिक शक्ति तो बढ़ती ही है साथ में मां दुर्गा भी प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद भी देती हैं।

सकंलप कैसे करे:-
नवरात्रि के पहले दिन से 9 दिनों के तक व्रत और उपवास का संकल्प लें। इसके लिए सीधे हाथ में जल लेकर उसमें चावल, फूल, एक सुपारी और अगर हो सके चाँदी का सिक्का रखें। कामना पूर्ति के लिए मन में ही संकल्प लें और माता जी के चरणों में जल छोड़ दें। 

नवरात्रि की पुजा विधि :-
कलश स्थापना करने के बाद इस प्रकार माँ का गुणगान करे:- 
मंगलाचरण सर्व कामना सिद्ध प्रार्थना भगवती भक्ति करी प्रदान, तुम भगवान फिर करो अम्बे अमर , यश कीर्ति सन्तान की तुम ही बचाओ आन कर हे कालिके आ से गोद में गौरी उठा, करो प्यार अपने लाल से 'चिन्तापुरनी हटा चिन्ता बचा ले पाप से । लक्ष्मी लाखों के भरे भंडारे अपने आप से,' नयनादेवी ' आओ नयनन में बिराजो आन तुम वैष्णवी माता ' बचा , विषयों से निज संतान तुम, मंगला मंगलमुखी मंगल करो नर नार में .चंडिका चढ़ शेर सुख दो सकल परिवार भद्र काली भद्र पुरुषों में , मेरा सम्मान ' ज्वाला ' मन जलन चरणों में तेरे ध्यान हो ' चामुण्डा ' चारों धाम चरणों में तेरे विश्राम बेचैन  में तुम लीन माता मन याम आठों हो।और उसके बाद दुर्गा शप्तशती का एक अध्याय पाठ हररोज करे। 

दुर्गा सप्तशती के पाठ की विधि:- 
पाठ करते समय भगवती दुर्गा का कोई फोटो पवित्र स्थान पर सजाकर रख अथवा देवी के भवन में माँ की मूर्ति के सामने पाठ करें।
2. पाठ करते समय बीच - बीच में मूर्ति को देखते रहें और फिर वह छवि अपने हृदय में धारण करने का अभ्यास करें । कुछ समय बाद माँ की छवि आंखें बन्द करने पर भी अन्नस में भी आपको ध्यान करते ही दिखाई पड़ने लगेगी । " महाशक्ति दुर्गा देव्यै नमः " इस मंत्र का जाप पाठ के अन्त में करके गंगाजल का चरणामृत ले । जब मन न लगे उपरोक्त मंत्र का जाप करने लगे । जब तक पूरा अध्याय न हो होंठ व जीभ आदि प्रयोग करें । कुछ समय बाद यह मंत्र हर समय अपने आप होने लगे इतना अभ्यास बढ़ा लें । ऐसा होने पर प्रथम तो कोई आपत्ति आयेगी ही नहीं ,अगर आई भी तो बहुत कम । ऐसा विश्वास रखना चाहिए । यदि सामर्थ्य हो तो पाठ समाप्त होने पर हर रोज एक कन्या का पूजन करें अथवा देवी के भवन में अरदास चढ़ा दें ।यह दुर्गा - सप्तशती पाठ " अपने आप में प्राचीन काल से प्रचलित दुर्गा सप्तशती का सरल भाव हिन्दी भाषा में होने से परम पवित्र मनोकामना सिद्ध करने वाली है।
इस आदिशक्ति भगवती जगदम्बा के असंख्य नाम हैं उनकी महिमा -अनुवादक का बखान कर पाना शरीरधारी प्राणी की शक्ति से बाहर की बात है ।

दुर्गा पूजा विधि और सामग्री:-
दुर्गा पूजा विधि तथा सामग्री श्री दुर्गा पूजा विशेष रूप से वर्ष में दो बार चैत्र व अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तक होती है । देवी दुर्गा के नव स्वरूपों की पूजा होने के कारण ' नव दुर्गा तथा नौ दिन में पूजा होने से नवरात्र कहा जाता है । चैत्र मास के नवरात्र ' वार्षिक नवरात्र और अश्विन के नवरात्र  शारदीय नवरात्र  कहलाते हैं। 
 भगवती दुर्गा के साधक को स्नानादि से निवृत हो शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को सजावे । मण्डप में श्री दुर्गा देवी की मूर्ति स्थापित करे । मूर्ति के दायीं ओर कलश स्थापन कर तथा कलश के ठीक सामने मिट्टी व रेत मिलाकर जौ बो दे। मण्डप के पूर्व कोण में दीपक की स्थापना करे । पूजन में सर्वप्रथम यथाविधि गणेश जी का पूजन करके अन्य देवी - देवताओं का पूजन करे। उसके बाद माँ दुर्गा का पूजन करना चाहिए ।

सप्तशती का पाठ ना तो जल्दी - जल्दी करना चाहिए और ना बहुत धीरे । पाठ करते समय एक ही आसन से निश्चित हो अचल बैठना चाहिए । सामग्री - जल , गंगाजल , पंचामृत  दूध , दही , घी , शहद , शक्कर , रेशमी वस्त्र , उपवस्त्र , नारियल , चन्दन , रोली , कलावा , अक्षत , पुष्प , पुष्पमाला , जयमाला , धूप , दीप , नेवैद्य , ऋतुफल , पान , सुपारी , लौंग , इलायची आपन , चौकी , पूजन पात्र , आरती कलश, दक्षिणा।
पाठ करते समय काम , क्रोध, लोभ और मोह से भी बचें। जगदम्बा भगवती चण्डी की मूर्ति ,चित्र या पुस्तक का विधि पूर्वक पूजन करें। और इन्हें कुछ ऊंचे स्थान पर पूजा के स्थान पर स्थापित करें। किसी कामना की पूर्ति के लिए पाठ करना हो तो विधि का पालन करना ही चाहिए।

श्री माता दुर्गा - चण्डी पाठ का फल पाठ करते समय , शरीर , वस्त्र और आसन शुद्ध । आसन ऊन का हो तो श्रेष्ठ । इसके साथ ही हृदय भी शुद्ध और श्रद्धा से पूर्ण होवे । मन में किसी के भी प्रति बुरी भावना नहीं होनी चाहिए, दूसरों की निन्दा , झूठ , कड़वी वाणी ना बोले , खान - पान में नियम , शुद्धता और सात्विकता का ध्यान रखें, बासी , भारी , जूठा और दूसरे के घर का भोजन नहीं करना चाहिए।
नवरात्रो के पाठ में नौ दिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। नास्तिक , दुष्टों , गौ - ब्राह्मण से द्वेष रखने वालों का संग नहीं करना चाहिए । नवरात्रि व्रत रखने वालों को दिन में सोना तथा चारपाई पर सोना भी वर्जित है। काम , क्रोध , लोभ और मोह से भी बचे । जगदम्बा भगवती चण्डी की मूर्ति , चित्र या पुस्तक का विधि पूर्वक पूजन करें और इन्हें कुछ ऊंचे पूजा के स्थान पर स्थापित करें। किसी कामना की पूर्ति के लिए पाठ करना हो तो विधि का पालन करना ही चाहिए। निष्काम पाठ के लिए विधि - विधान की उतनी आवश्यकता नहीं होती । कहने का भाव है कि इस बात का ध्यान रखें कि कुछ भी ना करने से कुछ ना कुछ करना सदा ही अच्छा होता है।

किस अध्याय का पाठ किस कार्य की सिद्धि करता है अध्यायों के अनुसार फल - सिद्धि :-
1. प्रथम अध्याय - चिंता दूर करने , शक्तिशाली शत्रु भय होने पर उसे नष्ट करने के लिए ।

2. दूसरा अध्याय - बलवान शत्रुधारा घर अथवा भूमि पर अधिकार कर लेने पर ।

3. तीसरा अध्याय - विजय प्राप्ति के लिए ।

4. चौथा अध्याय - धन , सुन्दर पत्नी तथा प्रवि - सिद्धि प्राप्ति के लिए । 5. पांचवां अध्याय - भूत - प्रेत बाधा , भय तथा बुरे स्वप्न फल के निवारण के लिए ।
6. छठा अध्याय - सभी कामना - सिद्धि के लिए ।

7. सातवां अध्याय - मन की मुराद पूरी करने के लिए ।

8. आठवां अध्याय - सुरक्षा के लिए ।

9. नवा अध्याय - संपत्ति तथा लाभ प्राप्ति के लिए ।
10. दसवां अध्याय -- शक्ति तथा सन्तान सुख के लिए ।
11. ग्यारहवां अध्याय - भुक्ति - मुक्ति तथा आगामी चिन्ता निवारणार्थ ।
12. बारहवां अध्याय - रोग निवृत्ति तथा निर्भयता के लिए ।
13. तेरहवां अध्याय - इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिए ।
किसी भी यात्रा से पूर्व दुर्गा कवच का पाठ कर लेना सबसे उत्तम है।

कन्या पूजन:-
इस प्रकार श्री दुर्गा के भक्त को देवीजी की अतिशय प्रसन्नता के लिए नवरात्रि में अष्टमी अथवा नवमी को कुमारी कन्याओं को अवश्य भोजन खिलाना चाहिए । इन कुमारियों की संख्या 9 या 11 हो तो जयादा सही है। किन्तु भोजन करने वाली कन्यायें 2 वर्ष से कम तथा 10 वर्ष से ऊपर नहीं होनी चाहिए । दो वर्ष की कन्या कुमारी , तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति , चार वर्ष की कल्याणी , पाँच वर्ष की रोहिणी , छः वर्ष की कालिका , सात वर्ष की चण्डिका , आठ वर्ष की शाम्भवी , नौ वर्ष की दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या सुभद्रा के समान मानी जाती है। इस प्रकार कुुँवारी कन्याऔ का पुुजन करे और माँ भगवती का आशीर्वाद ग्रहण करें।
कन्याऔ का पूजन करने के बाद जल पैर धोये, कुमारी देवी भोजन कर लें,  उनके सिर पर अक्षत छुड़वायें और उन्हें दक्षिणा दें । इस तरह करने पर महामाया भगवती अत्यन्त प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देती हैं।

जाप मंत्र........☆☆☆☆ 
ॐ क्रीं कालिकायै नमः की माता काली का बीजाक्षर है । यदि चित्त एकाग्र करके और पवित्रता के साथ इस मंत्र का पाँच लाख बार जप किया जाय तो माता काली के प्रत्यक्ष दर्शन होंगे ।

(2) ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चैः
यह माता भगवती देवी का परम प्रसिद्ध मंत्र है ।
दुर्गासप्तशती में यह मंत्र दिया हुआ है । इस मंत्र का जाप पाँच लाख बार करना चाहिए। यह मन्त्र तत्काल फल देने वाला है।

( 3) वं दुं दुर्गायै नमः दुं अथवा ' दुम् ' श्री दुर्गा का बीजाक्षर है । इस मंत्र का भी पाँच लाख बार जप करना चाहिए।


श्री महाकाली स्तुति कली काली महाकाली , कालिके परमेश्वरी । सर्वानन्द करे देवि, नारायणि नमोस्तुते ।। श्री शीतला माता की स्तुति शीतलं त्वं जगन्माता , शीतले त्वां जगत् - पिता । शीतले त्वं जगद्धात्री , शीतलायै नमो नमः ।। इस प्रकार श्री दुर्गा माता से प्रार्थना करें और माँ भगवती चरणों में अपनी मनोकामना रखे।

नवरात्रि व्रत-उपवास:-☆☆☆☆
माँ दुर्गा की पूजा करने के बाद ही फलाहार करें। यानि सुबह माता जी की पूजा के बाद दूध और कोई फल ले सकते हैं। नमक नहीं खाना चाहिए। उसके बाद दिनभर मन ही मन माता जी का ध्यान करते रहें। शाम को फिर से माता जी की पूजा और आरती करें। एक बार ही फलाहार खाये।

 नवरात्री निषेध वस्तुए:- 
1.नवरात्रि के दौरान तामसिक भोजन नहीं करें,यानि इन 9 दिनों में लहसुन, प्याज, मांसाहार, अंडा और झूठा भोजन नहीं करना चाहिए।

2. व्रत रखने वालों को नौ दिन तक नींबू नहीं काटना चाहिए.

3. व्रत में नौ दिनों तक खाने में अनाज और नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. खाने में कुट्टू का आटा, समाक के चावल, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, फल, आलू, मेवे, मूंगफली और सुखे मेवे खा सकते हैं।

4. विष्णु पुराण के अनुसार, नवरात्रि व्रत के समय दिन में सोना, तम्बाकू ,शराब, और शारीरिक संबंध बनाने से भी व्रत का फल नहीं मिलता है। यह सब चीजें निषेध मानी जाती है।

माँ भगवती को कया चढाये 
और कया ना चढाये:-
तुलसी पत्ती न चढ़ाएं.,माता की तस्वीर या मूर्ति में शेर दहाड़ता हुआ नहीं होना चाहिए, देवी पर दूर्वा नहीं चढ़ाएं, अगर जवारे बोए हैं और अखंड ज्योति जलाई है तो घर को कभी भी खाली ना छोड़ें।
दुर्गा माँ की तस्वीर की बाएं तरफ दीपक रखें।
मूर्ति या तस्वीर के दायें तरफ जवारे बोएं।
आसन पर बैठकर ही पूजा करें।
जूट या ऊन का आसन लाल या पिले रगं का होना चाहिए।

 नवरात्रि मे करे माँ दुर्गा  के 32 नामों का जाप जो हर मनोकामना पूर्ण करने वाले है.....

ॐ दुर्गा, दुर्गतिशमनी, दुर्गाद्विनिवारिणी,दुर्ग मच्छेदनी, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी ,दुर्गतोद्धारिणी, दुर्गनिहन्त्री, दुर्गमापहा, दुर्गमज्ञानदा,दुर्गदैत्यलोकदवानला,दुर्गमा, दुर्गमालोका,दुर्गमात्मस्वरुपिणी,दुर्गमार्गप्रदा, दुर्गम विद्या,दुर्गमाश्रिता,दुर्गमज्ञान संस्थाना,दुर्गमध्यान भासिनी,दुर्गमोहा,दुर्गमगा,दुर्गमार्थस्वरुपिणी, दुर्गमासुर संहंत्रि,दुर्गमायुध धारिणी,दुर्गमांगी, दुर्गमता,दुर्गम्या,दुर्गमेश्वरी,दुर्गभीमा,दुर्गभामा,दुर्गमो,दुर्गोद्धारिणी....
इस तरह इन  32 नामों का जाप करने से भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। और इस प्रकार नौ नवरात्रौ तक पूरी विधि विधान के साथ पूजा करने के बाद, हर रोज अंत में मां दुर्गा की आरती जरूर करें, क्योंकि आरती के बिना पूजा का फल मिलना संभव नहीं है।आरती करते समय 5 या 7 बत्ती रखकर आरती अवश्य करनी चाहिए। आरती का महत्व शास्त्रों के अनुसार यह बताया गया है यह सभी देवी देवताओं की स्तुति का वर्णन है।
 अगर हम आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो उनकी स्थिति का वर्णन करना जरूरी है।




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