अंकुरित भोजन और साबूत दालों के गुण और फायदे

 भोजन का सीधा सम्बन्ध हमारे स्वास्थ्य से होता है ,इसलिए जो भी भोजन खाएं सोच समझ कर खाएं। आयुर्वेद के अनुसार साबुत भोजन या अंकुरित भोजन हमारे सवास्थय के लिए बहुत ज्यादा लाभदायक और गुणों से भरपूर होते हैं। आज के इस लेख में मैं आपको कुछ ऐसे साबुत भोजन और अंकुरित दालें बता रहे है, जिनका उपयोग आप भी जरूर करें। अंकुरित भोजन को हमेशा रात को भिगोकर तैयार किया जाता है।
जिसमें में काला चना, मूंग दाल, मसूर, मक्का, गेहूं आदि सब श्रेष्ठ भोजन है। इसलिए इनको आप रात को भिगोकर और अंकुरित कर लें फिर आप अपनी इच्छा अनुसार कुछ फ्रूट्स और नींबू ,नमक डालकर एक चाट की तरह बना कर खाएं। इनके खाने से बहुमूल्य तत्व जैसे आयरन, प्रोटीन, विटामिन आदि गुण पाए जाते हैं। जो हमारी सेहत के लिए बहुत ज्यादा लाभदायक हैं। यह सारे भोजन प्रोटीन से भरपूर होते हैं, और प्रोटीन हमारे शरीर के लिए कई तरह की बीमारियों से बचाने के मदद करते है।
प्रोटीन बढते बच्चों के लिए बहुत जरूरी है जिसकी वजह से हमारे बच्चों की हाइट और दिमाग़ पर बहुत अच्छा असर होता है। अंकुरित भोजन हमें कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं। चना हृदय रोग ,मधुमेह रोगियों के लिए बहुत लाभदायक हैं। इसलिए इनको रात्रि में भिगो दें और सुबह उस पानी में नींबू और शहद मिलाकर पी लें और बाकी बचे भोजन को चाट की तरह बना कर खाएं। इनको खाने के बाद गर्म दूध नहीं पीना चाहिए । यह सब आहार पौष्टिकता से भरपूर है।

अकुरित अन्न के गुण और चमत्कारिक लाभ :-


काला चना:-


काला चना ऊर्जा का बेजोड़ श्रोत है, अधिक श्रम या पहलवानी के बाद बदाम की जगह अंकुरित चना खाया जा सकता है । यह शक्ति का प्रतीक घोड़े का मुख्य आहार है। चना शारीरिक श्रम करने वालों को सदा स्वस्थ रखने का सबसे उत्तम टॉनिक है, इसमें प्रचुरता से प्रोटीन उत्तम किस्म का अंकुरित चना में विटामिन ए, बी कंपलेक्स से सभी प्रकार के विटामिन तथा खनिज लवण पर्याप्त मात्रा में होते हैं। चने को छिलका उतारकर बेसन के रूप में भी खा सकते हैं। चने के छिलके में कब्ज निवारण होता है। चने को अंकुरित करके खाना भी सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मजदूरों के लिए भीगा हुआ व अंकुरित चना एक तरह का सस्ता पौष्टिक आहार है। काला चना  कालिस्टरोल के स्तर को कम करता है, रक्त और शुगर जैसी बिमारी को cantrol रखता है।यह  मधुमेह रोगियों के लिए श्रेष्ठ आहार है । हरा चना ना गर्म होता है ,ना ठंडा इसका प्रभाव सम्षाक होता है, इसलिए इसे सभी खा सकते हैं।

25से 30 ग्राम चना सुबह चावल के पानी में नींबू मिलाकर खाएं यह सभी प्रकार चर्म रोग और नपुसंकता को दूर करता है। काले चना खाने से  हृदय रोग,  मधुमेह रोग दूर होते हैं। इसमें   विटामिन ए, बी, सी पाया जाता है।

 हरा चना के गुण :-

 हरा चना कोमल, शितल, कसैला, वायु कारक और मलावरोधक, हल्का कफ, पित्त को दूर करने वाला व वीर्य को बढ़ाने वाला होता है। हरे चने को सेक कर खाने से बल वृद्धि और रुचि उत्पन्न होती है। सुखा चना अत्यंत बल कारक, दहा, रक्तपित्त, कफ विकार, मंदाकिनी, कुष्ठ, जुकाम आदि रोगों को दूर करने वाला होता है।हरे चने के सेवन से गठिया रोग दूर हो जाता है आधा लीटर पानी में 5 तोला चने को  उबाल ले जब पानी आधा रह जाए तो आग से उतारकर इस पानी को पीने से इसमें जलोदर रोग दूर हो जाता है। आधा पाव चने लेकर धोकर पानी में भिगो दें सुबह खूब चबाकर बचे हुए पानी को पी लें यह पानी वीर्य में वृद्धि करता है और कब्ज खत्म हो जाती है और शरीर में फुर्ती आती है। हरा चना खाने से शरीर  स्वस्थ और कातिवान होता हैं।

हरे चने का पानी पीने से चेहरा कातिवान हो जाता है। चने की दाल को रात को भिगोकर खाने से शरीर  बलशाली बन जाता है। यह खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है ,तथा कब्ज को दूर करता है। सिर्फ बंद नाक को खोलता है,और सर्दी जुकाम को ठीक ह

करता है । रात को सोने से पहले इसके पानी उपयोग करने से रात में गर्म पानी पीने से आवाज भी खुल जाती है।भुना हुआ चना खाने  आवाज़ सुरीली हो जाती है।चने के उबटन लगाने से दाग धब्बे  दूर हो जाते है । काले चना को हमेशा छिलके के साथ ही खाना चाहिए यह किसी टोनिक से कम नहीं है, इसलिए जो लोग चाहते हैं अपने खाने में इस्तेमाल करें क्योंकि इनकी ताकत का अंदाजा लगाना आसान नहीं है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं।यह इन्सान घोड़े जितनी ताकत देने वाला गुणकारी अन्न है।

 बाजराः ......

आयुर्वेद के अनुसार बाजरा रूक्ष तथा उष्ण होता है । यह पचने में भारी होता है । खाने में कम मात्रा में ही प्रयोग करें। इससे अधिक प्रयोग में कोष्ठबद्धता ,पथरी आदि तकलीफें होती है।बाजरे के भोज्य पदार्थों के खाने के बाद गुड जरूर खाना चाहिये । ऐसा करने से यह अच्छी तरह पच कर खून बढ़ाता है । गर्भवती महिलाओं इसको ना खाये क्योंकि ज्यादा खाने से गर्भपात हो सकता है ।शीत ऋतु में मधुमेही रोगियों के लिए बाजरे की रोटी उत्तम आहार है । यह रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ने नहीं देता । प्रोटीन की दृष्टि से यह चावल की अपेक्षा श्रेष्ठ आहार है । बाजरे की रोटी शहद के साथ खाने से कमजोरी , खूनी बवासीर , स्नायुयिक दुर्बलता , वीर्य दोष , हिस्टोरिया , मिर्गी , मधुमेह , अनिद्रा , यक्ष्मा , नपुंसकता , उच्च रक्तचाप आदि रोग ठीक होने में रामबाण का काम करता है।पथरी , गठिया वाले रोगी इसका प्रयोग ना करे, क्योंकि इसे अधिक खाने से यूरिक तथा आक्जेलिक एसिड बढ जाता है ।

इसे अंकुरित करके खाना और जयादा लाभदायक है।

मक्काः ☆☆☆☆☆

आयुर्वेद की दृष्टि से मक्का सुपाच्य , रूक्ष , ठण्डा तथा किचिंत कब्ज कारक होता है । यह वात, कफ एवं पित्तशामक है। इससे ग्लूकोज बनाया जाता है।इसमें सेलूलोज और सटार्च की अधिक पाई जाती है
परन्तु कैलोरी 35 से 65 प्रति सौ ग्राम में होती है ।आयुर्वेद की दृष्टि से मक्के का लावा मधुमेह तथा मोटापा के लिए उत्तम वरदान है। यह तृप्ति प्रदान करता है । परन्तु वजन तथा शर्करा को नियंत्रित रखता है। इससे बना पॉपकॉर्न काफी हल्का एवं पोषक होता है । गर्मी के मौसम में इसका मुट्टा प्रतिदिन खाने से रक्तहीनता दूर होती है । कच्ची मक्का का सूप गुर्दे तथा पथरी रोग में बहुत उपयोगी माना जाता है ।
मक्के से बने आहार ( रोटी , दलिया , भात , छोकल , पीठा ) को दुध , दही , छाछ खाने खाने से न्यू प्रोटीन की पूर्ति हो जाती है। इसमें वसा अधिक होने के कारण दुबले शरीर वाले वयकित जल्दी मोटे हो जाते हैं।

 मुंग दाल ••••••••


मुगं दालों में मूंग सबसे शीघ्रता से पचने वाला भोजन होता है । आयुर्वेद मतानुसार मूंग रूक्ष , लघु ग्राही , ज्वर , कफ - पित्तनाशक , हृदय तथा नेत्र को बल प्रदान करने वाला स्वादिष्ट तथा शक्तिवर्द्धक है दाल है। मूंग अति शीघ्रता से भीगता तथा अंकुरित होता है ।
इसका अंकुरण ,मधुमेह, हृदयरोग , पीलिया , बवासीर , कब्ज , अपच , अमाशायिक प्रदाह , उच्च रक्तचाप , मुंह के छाले तथा सभी रोगों में उपयोगी होता है। फ्लू के रोगीयो को 12 घन्टे पूर्व मूंग का पानी सुबह शाम देना चाहिये जो बहुत लाभदायक होता है । मूंग का पानी हैजा , टायफायड , सभी प्रकार के बुखार , मूत्राशय व गुर्दे का सक्रमण , चेचक , खसरा में उपयोगी है । इसके उबटन से चर्मरोग ठीक होते है ।

मसुर :-•••••••••

आयुर्वेद में मसूर की दाल सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है पहले स्थान पर मूंग की दाल मानी जाती है ,और मसुर की दाल दुसरे सथान पर मानी जाती है। मसूर की दाल वात पित्त सभी प्रकृतिवालों के लिए बेहद उपयोगी है । यह जल्द पचने वाली रक्त तथा बलवर्द्धक होती हैं।यह कफशोषक होने के कारण कफ, पित्त प्रकृति वालों के लिए श्रेष्ठ आहार है । नेत्ररोग , मूत्रकृच्छ , रक्तविकार , ज्वर , अतिसार तथा संग्रहणी में उपयोगी है ।
यह पथरी को गला कर बाहर निकाल देती है । प्रतिदिन 25 ग्राम अंकुरित मसूर खाने से नेत्र ज्योति बढ़ती है ।गर्भावस्था और छोटे बच्चे की माँ को मसूर की दाल तथा अंकुरित मसूर अवश्य खाएँ।

सोयाबीन:-•••••••


सोयाबीन में विशेष प्रकार का एक तत्व लेसिथिन होता है जो त्वचा को सुन्दर , मुलायम तथा आकर्षक बनाता है। लेथिसिन हृदय रोग उच्चरक्तचाप से भी बचाता है । यह कॉलेस्टरॉल को नियंत्रित रखता है । इससे एन्टीबायोटिक औषधियों का निर्माण होता है । सोयाबीन एक ऐसा पुष्टिकारक अन्न है , जिसमें प्रोटीन , वसा , श्वेतसार , खनिज , लवण , लोह , विटामिन बी आदि पोषक तत्व प्रचुरमात्रा में विद्यमान होते हैं । इसमें मिलने वाला प्रोटीन किसी भी आमिष - निरामिष पदार्थों में पाये जाने वाले प्रोटीन से उन्नत किस्म का होता है । यह प्रोटीन उच्च कोटि का होने के साथ ही 35-40 % तक पाया जाता है । यह बालक , वृद्ध तथा रोगी सभी के लिये हितकर है । इससे खाने से कब्ज और गैस जैसे रोग नहीं होते तथा बालकों का शारीरिक विकास होता है । इसमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी कम होती है । इसके नियमित प्रयोग से बल - वीर्य की वृद्धि होती है ।
शाकाहारियों को तो प्रकृति के तरफ से इस अनमोल भेंट का अवश्य खाने में प्रयोग करना ही चाहिये। 

अगर आप भी स्वस्थ रहना चाहते हैं तो अपने भोजन में अंकुरित भोजन जरूर शामिल करें । कयोंकि सवास्थय ही सबसे बड़ा धन है । अपने आपको ठीक रखने के लिए और डाक्टरों से दुर रहने के लिए अगर थोडा कष्ट उठाना पडे तो जरूर उठाये। 










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