देवताओं की आरती क्यो और कैसे करें...!!

देवताओं की आरती क्यों और कैसे ?

जिस घर में हररोज आरती होती हो वहां  चरण कमल चित्त लाय हरि प्रभु हर पल निवास करे ,जोत सुख की अनन्त जगाय। आरती करने और सुनने से बहुत फायदा और मानसिक शांति मिलती है। देशी घी की ज्योति से , कपूर की ज्योति से वातावरण शुद्ध होता है, संकट , चिंता , दुःख , कष्ट , बिमारी परेशानी , बाधायें सारी दूर होती है । सुबह और शाम दोनों समय विवेक को खो देने से सर्वग जाने का रास्ता खुल जाता है ऐसा हमारे वेदों में माना गया है।

अपने इष्ट देव प्रभु की आरती जरूर करनी चाहिए , पूरी श्रद्धा और भावना सहित आरती करते समय पूरा ध्यान प्रभु के चरणों में , और उनके मुंख मण्डल को निहारते रहें , उस समय संसारिक बातें मन में न आने दें। आरती करके आखों में जरूर लगाऐं , हाथ अवश्य धोयें उसके बाद ही भोजन करें । आरती को आरात्रिक ' अथवा ' आरार्तिक ' और ' नीराजन ' भी कहते हैं । पूजा के अन्त में आरती की जाती है । पूजन में जो त्रुटि रह जाती है , वह आरती से उसकी पूर्ति हो जाती है। स्कन्दपुराण में कहा गया है- मन्त्रहीन क्रियाहीनं यत् कृतं पूजन हरेः । सर्व सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिये।। अर्थात पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है। आरती करने का ही नहीं , आरती देखने का भी बहुत बड़ा पुण्य लिखा है। ' जो देवदेव चक्रधारी श्री विष्णुभगवान् की आरती देखता है , वह सात जन्मों तक ब्राह्मण होकर अन्त में परमपद को प्राप्त होता है।' जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है , वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परमपद को प्राप्त होता है । आरती में पहले मूलमन्त्र जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो , उस मन्त्र के द्वारा तीन बार पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये और घण्टा , खड़ताल , ताली , ढोल , नगाडे , शंख , घड़ियाल आदि महावाद्यों के तथा जय - जयकार के शब्द के साथ शुम पात्र में घृत से या कपूर से विषम संख्या की अनेक बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये- साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है , इसे ' पंचप्रदीप भी कहते हैं । कपूर से भी आरती होती है । आरती के पाँच अंग होते हैं- ' प्रथम दीपमाला के द्वारा , दूसरे जलयुक्त शंख से , तीसरे धुले हुए वस्त्र से , चौथे आम और पीपल आदि के पत्तों से और पाँचवें साष्टांग दडवत् से आरती करें। आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाये , दो बार नाभिदेश में ,एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमायें।
इस प्रकार अपने इष्ट देव की आरती हर रोज करें वैसे तो साल में बहुत सारे त्यौहार आते हैं पर अब मां दुर्गा के नवरात्रि आने वाले हैं इसलिए नवरात्रों में मां की अखंड ज्योति के साथ आरती की विधि भी जरूरी बताई गई है। मां दुर्गा की पूजा बिना आरती के अधूरी है, इसलिए पूजा करने के बाद सुबह शाम आरती अवश्य करें तभी पूजा का फल संभव है। और इस बात का भी धयान रखे सबसे पहले किसी भी पूजा को आराम करने से गणेश जी की आरती सबसे पहले करें उसके बाद ही दूसरी आरती करने का फल मिलता है। सुनने वाले को ही मिलता है इसलिए अगर कहीं मंदिर में आरती हो रही हो तो उसे जरूर ध्यान से सुने अगर पूजा पाठ में कोई त्रुटि रह गई हो तो वह आरती करने से पूरी हो जाती हैं ।आरती करते समय जल्दबाजी ना करें आरती धीरे-धीरे और प्यार सहित करें।


Maa Durga ki  Aarti:- 

नवरात्रि में मां दुर्गा की पुजा का विशेष महत्व है। नवरात्रि के समय विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा अर्चना की जाती है। और सबसे बाद में आरती करे फिर प्रसाद को परिवार में बाँट दे। जिससे माँ दुर्गा प्रसन्न होकर भक्तों के दुखों को हर लेती हैं। साथ ही वो सभी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करती हैं।
आरती के समय थाल में कपूर या फिर गाय के घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की आरती करनी चाहिए। आरती के साथ ही शंख और घंटी अवश्य बजाएं। आरती के समय शंघनाद और घंटी की ध्वनि से घर के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नकारात्मकता के खत्म होने से व्यक्ति का विकास होता है, उन्नति के द्वार खुल जाते हैं।

माँ दुर्गा जी की आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव री।। जय अम्बे गौरी,...।
मांग सिंदूर बिराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रबदन नीको।। जय अम्बे गौरी,...।
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै।। जय अम्बे गौरी,...।
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी।। जय अम्बे गौरी,...।
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत समज्योति।। जय अम्बे गौरी,...।
शुम्भ निशुम्भ बिडारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती।। जय अम्बे गौरी,...।
चण्ड-मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे।। जय अम्बे गौरी,...।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।। जय अम्बे गौरी,...।
चौंसठ योगिनि मंगल गावैं, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू।। जय अम्बे गौरी,...।
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता।। जय अम्बे गौरी,...।
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी।। जय अम्बे गौरी,...।
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति।। जय अम्बे गौरी,...।
अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै।। जय अम्बे गौरी,..
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लक्ष्मी जी की आरती :-


 ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निस दिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय...
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।,सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय...
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय...

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता , खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय...
 शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ,रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय...
 महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय...

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 वैष्णो माता की आरती :-

जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता ,
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
शीश पे छत्र बिराजे, मूरतिया प्यारी,
गंगा बहती चरनन, ज्योति जगे न्यारी,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
ब्रह्मा वेद पढ़े नित द्वारे, शंकर ध्यान धरे ,
सेवक चंवर डुलावत, नारद नृत्य करे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!

सुंदर गुफा तुम्हारी, मन को अति भावे,
बार-बार देखन को, ऐ मां मन चावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!

भवन पे झण्डे झूले, घंटा ध्वनि बाजे,
ऊंचा पर्वत तेरा, माता प्रिय लागे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट पुष्प मेवा,
दास खड़े चरणों में, दर्शन दो देवा ,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!

जो जन निश्चय करके, द्वार तेरे आवे ,
उसकी इच्छा पूरण, माता हो जावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!

इतनी स्तुति निशदिन, जो नर भी गावे,
कहते सेवक ध्यानू, सुख संपति पावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!

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चरणामृत का महत्व  : - 
भगवान के चरणों का स्पर्श प्राप्त करके जल तीर्थ चरणामृत बन जाता है , वैसे ही भगवान को निवेदित किया गया नैवेद्य प्रसाद बन जाता है । और उस चरणामृत तथा प्रसाद को ग्रहण करने से उपासक पवित्र हो जाता है। उसी प्रकार स्पर्श किए गये जल अर्थात चरणामृत के अंतर को चर्म चक्षुओं से नहीं पहचाना जा सकता । इस अंतर को दिव्यदृष्टि एवं सूक्ष्म बुद्धि से निश्चित ही देखा जा सकता है वैसे ही परिक्रमा न किए और परिक्रमा किए हुए व्यक्ति के आभामण्डल के अंतर को सूक्ष्मग्रही अंतर्चक्षुओं से अर्थात ज्ञान दृष्टि से देख सकना सम्भव है । भगवान् के चरणामृत को एक क्षणभर भी जो कोई अपने मस्तक पर धारण करता है उसे तत्काल सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता है । और वह भगवान् का प्रिय होता है।


प्रसाद का महत्व:-........
प्रभु का प्रसाद एक अनमोल निधि है प्रसाद को पूर्ण श्रद्धा सहित दोनों हाथों से ग्रहण करना चाहिए- प्रसाद में , प्रभु का आर्शीवाद , खुशियां , आनन्द , सुख , चैन , दया मिली हुई होती है , अतः प्रसाद का एक कण भी नीचे धरती पर नहीं गिरने दें । प्रसाद को झूठे हाथों में कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए । शास्त्रों में लिखा है कि जब भगवान भोग लगाएं , तब तो घंटी अवश्य बजनी ही चाहिए और भगवान् को भोग लगाते समय किसी कपड़े से पर्दा भी जरूर करे।


अखण्ड ज्योति के महत्व:-
घी का दीपक वैभव , धन , लक्ष्मी , सुख शान्ति बढ़ाता है घर के सदस्यों को आरोग्य रखता है , शुभ करता है , कल्याण करता है , और शत्रुओं का नाश करता है ।
अखण्ड ज्योति 24 घण्टे और सालों - साल रखने से उपरोक्त बातें पुर्णता से प्राप्त रहेगी । दीप जलाकर  दीपक को दीवट या अक्षत (चावल) आदि पर रखना चाहिये , सीधे जमीन पर रखना अखंड ज्योती का मना है। सायंकालिक भोजन कर दिन भर के अपने कृत्यों का दीपक के आगे सिंहवलोकन करना चाहिये ।

तेल का दीपक पापों का नाश करता है। 
नारायण प्रभु की आरती में बहुमुखी विशम बतिया 3,5,7,9,11 संख्या में बत्तियों के दीपक से आरती करने से प्रभु जल्दी प्रसन्न हो जाते है ।
प्रभु की जो पूजा - पाठ - कर्म हम जो करते है - दीपक - उनका साक्षी माना जाता है ।
दीपक अंधकार को अज्ञान को दूर भगाता है , दीपक ज्ञान का प्रतीक है घृत के दीपक को दाहिने हाथ की तरफ और तेल के दीपक को बाएं हाथ की तरफ रखना चाहिए ।
दीपक जलाकर हाथ अवश्य धो लेना चाहिए दीपक से दीपक या दूसरी कोई भी चीज जलाने से पाप लगता है और दरिद्रता आती है । संध्या को दीपक सूर्य अस्त के समय जलाना चाहिए- जलाकर हाथ धोकर यह प्रार्थना श्रद्धा सहित करके पुष्प चढ़ाएं ओर उसके बाद एक बार हाथ फिर धो लें । फिर प्रार्थना करें : - ॐ शुभम् करोती कल्याणम् , अरोगय धन सम्पदा। मम शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप: ज्योती नमोस्तुते।

सावधानी : - अखण्ड दीप ज्योति के लिए 
 महाचेतना का परम प्रकाश का प्रतीक है, घर में प्रकाश का ज्ञान का , सुख , शांति का प्रतीक है
लेकिन अखण्ड दीप जलाकर रखने में अनेक सावधानी बरतनी चाहिए
जैसे चुहों से रक्षा रखनी , हवा से , पंखें से . छोटे - छोटे बालकों को , आग दुर रखे और कभी अखंड ज्योती जलाने के घर को बदं करके ना जाये अगर ये सब सावधानियां संभव नहीं हो तो ना जलायें।

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