मन को नियंत्रित कैसे करें और स्वयं को पहचानो मै कौन हूँ ( गीता ज्ञान)

मन को नियंत्रित कैसे करें------
 यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो अपने इंद्रियों को वश में करने के लिए मन पर नियंत्रण करना सबसे जरूरी है, और मन को वश में करना बड़ा ही कठिन काम है। इसके लिए एक सीधा और पक्का सा उपाय है कि मन को प्रभु नारायण में पूरी तरह लगा दो। चाह और लालसा के कारण ही मन में कुछ जिज्ञासा से उत्पन्न होती हैं। हमारी जीभ को चटपटा और खट्टा मीठा खाने की लालसा, नाक को अच्छी सुगंध सुधने  कि चाह व कानों  को मीठे वचन सुनने की चाह और हमारे  नेत्रों को सुंदर सुंदर दृश्य देखने के अभिलाष ,शरीर को बढ़िया से बढ़िया वस्त्र पहनने के ऐशो आराम करने की चाहना, प्रत्येक इंद्रियो को अपनी अलग अलग जाना सिर्फ मन के कारण हैं और यह चाहाना इंद्रियों को  सिर्फ मन के कारण है।
 यह तुम जितनी पूरी करोगे उतनी ही ज्यादा यह चाह बढ़ती जाएगी, पूरी तो कभी होगी ही नहीं और चाह, लालसा पुरी ना होने पर दुख, ईर्ष्या,  जलन व देवेश की भावना बदला लेने की भावना पैदा होगी अर्थात दुख ही इन सबका  एकमात्र कारण हैं।
 मन को वश में करना और प्रभु मे लगाना ऐसा कर सको तो फिर शांति  और आनंद ही  रहेगा। प्रभु तक पहुंचने का रास्ता सबसे आसान हो जाएगा।  और चाह और लालसा को खत्म कर भगवान् के दास  बन जाओगे और फिर  समझो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। 
 यह जन्म और अगला जन्म भी सफल हो जाएगा कई बार टीवी पर जो बातें हम देख लेते हैं हमारे दिमाग में समृति पट पर अंकित हो जाती हैं। अच्छी हो या बुरी अच्छी बातें अच्छे संस्कार की बातें ही देखने सुनने जन्म के संस्कारों का भी प्रभाव रहता है। अच्छा हो या बुरा जो भी हो इस जन्म में हम जो कार्य कर रहे हैं जिन संस्कार में हम जी रहे हैं उन सभी संस्कारों का प्रभाव हमारे इसी जन्म में अगले जन्म में भी अवश्य पड़ेगा। अतः अच्छे  ही संस्कार करें, अच्छे वातावरण में रहे, बच्चों के अच्छे संस्कार दे व प्रभु नारायण को समरण, उसमें भक्ति, उसकी सेवा, दीन दुखियों  की सेवा,  संतसग ,कीर्तन, भजन, पुजा पाठ,हवन आदि से अच्छे संस्कार पैदा होते हैं।
 दान हमेशा दोनों हाथों से सच्चे मन से देना चाहिए ज्यादा से ज्यादा दान देना चाहिए जो दान देता है वह कभी भी घाटे में नहीं रहता घाटे में लेने वाला ही रहेगा। दान देने से मन शांत होता है,व दान देने वाले का कल्याण भी होगा और पाप भी कटेंगे। मन पर नियंत्रण,मन को को शांत रखने के लिए शुद्ध सात्विक भोजन, मछली, अंडा,न खाए।  मानव के पास जीभ एक ऐसा यन्त्र है चाहे तो आदर दिलवा सकती और चाहे पिटवा सकती हैं। 
महाभारत एक इसका जीता जागता उदाहरण है। द्रौपदी ने केवल इतना ही कहा था कि अंधे के पुत्र अंधे ही होते हैं जिसकी वजह से भयंकर परिणाम महाभारत के रूप में सामने आया। उस कारण  भारत ने जो प्रगति की थी वह सब नष्ट भ्रष्ट हो गई। इसीलिए मन का संतुलन बनाए रखना जीवन की सबसे बड़ी उपयोगिता है।

स्वयं को ( मैं ) पहचानो :--
 स्वयं को देखने के लिए जगत को देखना बंद करना पड़ेगा,  अर्थात आत्मचिंतन से भिन्न सभी चेस्टाए जगत को देखना है। अतः बाहर का पट बंद कर अंदर के पट खोलें अंदर के नेत्र खोलने पर मनुष्य को वह धन मिलता है, जिसे पाने के बाद कुछ और पाना शेष नहीं रह जाता। जिसे चोर भी चुरा नहीं सकते, डाकू भी छीन नहीं सकते और अपने सगे संबंधी भी बाँट  नहीं सकते। 
 अपितु  जो एक बार मिलने के पश्चात कभी अलग नहीं होता। यदि आप आहार-विहार को शुद्ध करके अपने चित्तवृत्ति को बाहरी प्रपंचो से मोड़कर अंतर्मुख करना आरंभ करें तो शीघ्र आपको अंदर अपने अंदर ही वह धन, आनंद मिलेगा जो कभी समाप्त होने वाला नहीं है। तन जब तक श्मशान में नहीं पहुंचेगा तब तक तन को चैन नहीं और मन जब तक भगवान से नहीं मिलेगा तब तक मन में चैन नहीं। कहने का भाव यह है कि सिर्फ भौतिक तत्वों का कार्य है इसलिए जब तक यह भौतिक तत्वों में नहीं मिलेगा तब तक इस की यात्रा चालू रहेगी और मन भगवान का अंश है इसलिए जब तक भगवान से नहीं मिलेगा तब तक इसे भी शांति नहीं मिलेगी। आत्मबोध मानसिक रोगों की अचूक एव स्थायी औषधि है। साधक को चाहिए कि जगत के मिथयात्व तथा आत्मा के स्वरूप और उसकी अमरता,  अजरता के विषय में सदैव चिंतन करें। ऐसा करने से जगत का मिथ्यात्व तथा आत्मा के नित्यता, मुकतता का बोध सुदृढ होता हो जाता है, और यही आतमनिष्ठा है।
 सबसे पहले अपने आप को देखो मैं क्या हूं .. ?
किन गुण धर्म वाला हूं, किंतु देखो ओढनी उतार कर अर्थात शरीर की वास्तविकता को जानने के लिए वस्त्र आभूषण हटाकर देखना जाना चाहिए। वैसे ही नाम ,रूप ,जाति, संबंध, पद तथा देह  इंद्रिय अंत: करण आदि का आवरण उतारकर स्वयं को देखना जानना बहुत जरूरी है।  इन सब को उतारने का अर्थात अलग करने से केवल एक मात्र अपने आप ही शेष रह जाएगा। बस यही स्वयं को देखना है। स्वयं को जानना स्वयं को पाना भगवान महावीर ने कहा जीवन और यदि कुछ मूल्यवान है तो वह स्वयं को मूल्य है। स्वयं के मूल्य से बढ़कर दुनिया में कोई और मूल्यवान हो ही नहीं सकता। जो उसे पा लेता है वह सब कुछ पा लेता है, और जो उसे खो देता है वह सब कुछ खो दे देता है। मालामाल होने की कसौटी है स्वयं को पा लेना और कंगाल होने की कसौटी है स्वयं को खो देना। यदि किसी ने स्वयं को खोकर जगत के सारे ऐश्वर्या पा लिए  है तो समझना उसने बड़ा महंगा सौदा किया है।  वह हीरे मोती देकर कंकड़ पत्थर ले आया।
 श्री कृष्ण भगवान जी भी यही कह रहे हैं ,तुम देखो मैं को मानना छोड़ दो तब मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हो जाऊंगा। किंतु जब तुम स्वयं को मैं मानोगे, देह में मानोगे तो मैं अंतर्ध्यान हो जाता हूं। मैं तब रहता हूं जब तुम नहीं रहते हो जब तुम रहते हो तब मैं नहीं रहता। प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण तत्व है, लेकिन वह देखो मैं मानता है ।
इसलिए सब बेकार में पड़ जाता है। यदि आत्मा को मैं माने तो आप ही का नाम कृष्ण है। वास्तविक में मैं को पहचान लो वह तो अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, कभी बिगड़ नहीं सकता। हम भी यदि कार्य करते समय स्वयं को करता ना माने, भोग भोगते हुए भी स्वयं को नित्य, शुद्ध व मुक्त माने तो जो निराकार परमात्मा श्री कृष्ण के अंत:करण में प्रकट हुआ वह सब लोग हमारे अंत करण में भी प्रकट हो सकता है। अपने व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए प्रत्येक के लिए आवश्यक है कि वह आत्म लोकन कर अपनी क्षमताओं तक अपनी कमियों का सही रूप से मूल्यांकन करें। वास्तव में 
आत्मअवलोकन एक बड़ी शक्ति है। जिससे मनुष्य अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है ।जिस व्यक्ति को स्वयं पर विश्वास नहीं होता है, वह निसंदेह उसमें आत्मविश्वास की कमी होती है। आत्मविश्वास की कमी मनुष्य के कार्य करने की इच्छा और क्षमता दोनों को प्रभावित करती है। स्वयं की कार्यक्षमता और उसमें  स्वयं  मे विश्वास ही आपको काम करने के लिए प्रेरित करता है। यही सफलता की कुंजी है। अपने व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए सबसे पहले आपको अपने क्षमता पर विश्वास करना होगा। धैर्य संयम तथा सकारात्मक सोच से अगर आप अपनी कमजोरियों को पहचान कर उन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे तो निसंदेह सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसमें कोई भी शक की गुंजाइश नहीं है ।असफलताओं के बावजूद अपनी पिछली गलतियों को पहचान कर उन्हें दूर करने का बार-बार प्रयास करें सफलता निश्चित रूप से मिलेगी। आप जितना कठोर प्रयास करेंगे उतने ही अधिक भाग्यशाली होंगे। अपनी असफलताओं का दोष दूसरों के सिर पर मत मढे यह बहुत से लोगों की आदत होती है। इससे भी अधिक कुछ लोग भाग्य की असफलता का दोषी करार देते हैं। ऐसे में व्यक्ति अपनी कमजोरियों और गलतियों का विश्लेषण ना करके उन्हें और अधिक बनने में सहायता करते हैं। हमारे अंदर एक महान शक्ति हैं। जिसे हम पहचान नहीं सकते। जिस दिन हमने अपने अंदर की शक्ति को पहचान लिया और अपने ऊपर विश्वास कर लिया उस दिन हमने अपने आप पर विजय पा ली और भगवान को प्राप्त कर लिया। यदि आप 33 करोड़ देवी देवताओं पर विश्वास कर सकते हो तो  फिर अपने ऊपर क्यों नहीं....
  इंसान के अंदर इतनी शक्ति है अगर वह कुछ ठान ले तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है, इसलिए अपनी शक्ति और खुद को पहचानो। फिर आप चाहे जो भी पा सकते हो ,अगर आप चाहो तो भगवान को पा भी सकते हो और उसके साक्षात दर्शन भी कर सकते हो। 
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