भगवद्गीता ज्ञान क्या है, और गीता हमें कया सिखलाती है...?


गीता हमें क्या सिखलाती है.....?
 जो हुआ वह अच्छा हुआ । जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है । जो होगा वह भी अच्छा ही होगा । तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो । तुम क्या लाए थे जो तुमने खो दिया । तुमने क्या पैदा किया था जो नष्ट हो गया । तुमने जो लिया यहीं से लिया । तुमने जो दिया यहीं पर दिया । जो आज तुम्हारा है , कल किसी और का था । परसों किसी और का हो जाएगा । परिवर्तन संसार का नियम है । जिसे तुम मृत्यु समझते हो , वही तो जीवन है । न यह शरीर तुम्हारा है , न तुम इस शरीर के हो । यह अग्नि , जल , वायु , पृथ्वी और आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा । परन्तु आत्मा स्थिर है । तुम अपने आपको भगवान् को अर्पित करो । यही सबसे उत्तम सहारा है । जो इसके सहारे को जानता है वह भय , चिन्ता और शोक से सर्वदा मुक्त है ।
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गीता का ज्ञान और भगवान् श्री कृष्ण की बातें:------

गीता "ज्ञान  का - भक्ति का कर्तव्य का भाव का प्रेम का प्रभू से मिलने का एक ऐसा महासागर -जिसकी गहराई का रहस्यों का- किसी को भी पूर्ण ज्ञान  जान  पाना अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है । नित्य नये नये भाय व नया ज्ञान पैदा होता -जितना गहरा इसमें गोता मारेगे उतना ही ज्यादा आनन्द , शान्ति और ज्ञान की प्राप्ति होगी ।  गीता का केन्द्रीय एक भाव यही है कि तुम निरन्तर कर्म करते रहो परन्तु उस कर्म में आसकत मत होओ- उसके अच्छे या बुरे फल को प्रभु नारायण को अर्पण कर दो । शुभ और अशुभता तो प्रत्येक कर्म में दोनों छिपे हुए होते हैं - उनको देखने की चेष्टा मत करो । किसी को भी " मेरा है " " मेरी है " मत कहो पूर्ण निश्चय को पूर्ण श्रद्धा से मानो ।
 गीता हारे हुए मनुष्य में हिम्मत पैदा करती है और सदगुणो से भर देती है।   गीता को जितनी बार भी पढोगे - उसकी जितनी भी गहराई में हम जाऐगे , हमें उतना ही ज्यादा आनन्द , शान्ति और तृप्ती मिलेगी ।
 गीताजी का हर घर में प्रचार होना चाहिये - प्रत्येक मनुष्य को रोम - रोम में समस्त जातियों - समस्त
समस्त धर्मों , समस्त प्राणियों के लिये है । गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते है कि कर्म कभी मत छोड़ो कर्म न करने से घोर पाप लगेगा , कर्म करते रहो । 
मैं कृष्ण सम्पूर्ण जगत का मालिक हूँ , प्रभु हूूँ  , मुझे जगत से प्रेम है , में भी कर्म करता हूँ । मुझे किसी भी कर्म से किसी भी प्रकार का लाभ नहीं , तो भी में कर्म करता हूँ । यदि मैं एक क्षण के लिये भी कर्म करना बन्द कर दूं , तो यह सम्पूर्ण जगत ही नष्ट हो जाएगा । भगवान् श्री कृष्ण की इस वाणी से यह सिद्ध हो जाता है कि यह सब जो नियमित अनियमित जो भी हो रहा है वह अपने पास स्वयं नहीं हो रहा है- प्रकृति को स्वयं भगवान् चला रहे है । 

 भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा है कि जो जो भक्त जिस - जिस देवता - रूप की श्रद्धा से पूजा करने की इच्छा करता है , उस उस देवता में ही मैं उस भक्त् की श्रद्धा को स्थिर कर देता हूँ । 
वह भक्त्त उस श्रद्धा से युक्त हुआ उस देवता के पूजन की चेष्टा करता है और परमात्मा की निश्चित प्रक्रियानुसार उस देवता से वह निस्संदेह इच्छित भोगो को प्राप्त करता है । क्योंकि इन सब में मैं ही ( भगवान् श्री कृष्ण ) वास करता हूँ । मेरे अनेक रंग , अनेक रूप ,और अनेक नाम है । भक्त जो भी रंग , जो भी रूप , जो भी मूरत , जो भी नाम , जो भी मान , जो भी उसको अच्छा लगता है - उसी को भज सकता है ।
श्री कृष्ण भारत के उन विशिष्ठ योगियों में से थे जिन्होंने देश को नैतिक , सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत बनाने के लिए भरसक प्रयत्न किए , गीता जैसा ज्ञान दिया , किन्तु खेद है कि देश ने उनके उपदेश को जीवन में उतारा नहीं । भगवान श्रीकृष्ण का कहना है कि निष्क्रिय होकर बैठे रहना सर्वथा अधर्म है और अन्याय कर रहे अपने सगे बघु - बान्धव को दंड देना धर्म है ।
 श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिए गए उपदेश केवल एक धर्म विशेष के लिए नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए हैं । गीता में भगवान ने अपनी सारी कृपाए उड़ेल दी है । गीता कोई एक मजहब, मत या पंथ का ग्रंथ नहीं । यह मोक्ष प्राप्ति का ग्रंथ है।
 गीता मानव जीवन को सार्थक बनाने वाली विद्याओं से परिपूर्ण ग्रंथ है । मनुष्य की मांग है कि सदा सुखी रहू , लेकिन गलती यह होती है कि जो चीजें सदा रहेगी नहीं , उनमें वह सुख खोजने लगता है । मानव देह को ईश्वर की सुन्दरतम कृति और अहैतुकी कृपा मानो । अन्य योनियाँ जहां अपने - अपने कर्म भोगती हैं , वहां मनुष्य उस कलाकार की कला का ऐसा अद्भुत नमूना है कि उसका मार्गदर्शन पाकर उसकी बराबरी कर सकता है।
अनन्त ऐश्वर्य , अनन्त माधुर्य , अनन्त सौन्दर्य अपने में निखार सकता है । भगवान् नारायण ने ब्रह्मा जी से कहा कि जब यह संसार नहीं था ,तब भी में था और अब जब यह संसार है तब भी मैं हूं । यह मेरी माया का चमत्कार है । यह माया की जादूगरी है ।
 भगवान की माया शक्ति असली भगवान को छुपा देती है और नकली संसार को दिखा देती है । श्री कृष्ण  की यह बातें समझ नहीं पाते । जिनकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ है , उन्हें तो श्रीकृष्ण सामान्य मनुष्य जैसे ही दिखेगें क्योंकि इंद्रियों से जो दिखता है , वहीं उन्हें सच्चा लगता है। कृष्ण का जीवन दुःखों की लंबी कहानी है । उनके दुखों के आगे तुम्हारा दुख कुछ भी नहीं । जन्म कारावास में हुआ , कुटुम्बी विरोधी निकले मगर उन्होंने अपने को दीन - हीन कभी नहीं समझा । श्रीकृष्ण हर अवस्था में मुस्कुराते रहते हैं । जीवन की तमाम परेशानियों के बीच रहकर भी चित्त की समता , मधुरता बनाए रखना हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए ।
 कृष्ण का अर्थ है जो सबको आकर्षित करे - मित्र को भी , शत्रु को भी । ऐसा ही जीवन तुम्हारा भी होना चाहिए । वास्तव में तुम श्री कृष्ण से कम नहीं । तुम बुद्ध से महावीर से किसी से कम नहीं मगर शरीर को अपना मान बैठे हो,जगत को सच्चा मान लिया , तभी से दुर्भाग्य का आरंभ हो गया । संसार की ओर आकर्षित हो रहे आपके मन को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो अवतार हुआ है , उसी का नाम कृष्ण है ।
 श्री कृष्ण भगवान सिर्फ 6 दिन के ही हुए थे जब उनको जान से मारने के लिए कंस ( मामा ने ) ने पूतना को जहर पिलाने के लिए भेजा , अघासुर , बकासुर , धेनुकासुर , सकटा , आदि अनेक महाराक्षषों को भेजा,मगर सभी  बालक कृष्ण जी के हाथों मारे गये।  जो मनुष्य  भगवान् श्री कृष्ण जी का निष्ठावान भगत है, नित्य गीता पड़ता है, भजन करता है, उसके ऊपर किसी भी प्रकार का मारण, मंत्र या टोटका या मुँठ काम नहीं करती।
  उस मनुष्य का कोई भी कुछ बिगाड़ नही सकता, बल्कि अशुभ करवाने वाले का ही अशुभ होता है  मन्तरो के विपरीत  प्रभाव से करवाने वाले का ही नुकसान हो जाएगा । 
 श्री कृष्ण का नाम जपते रहने से यमराज भी उसका कुछ नहीं बिगाड सकता। श्री कृष्ण शरणं मम॔  
इस मन्त्र का जो जाप करता है, उसके सब रोगों का शमन व पापो का नाश   हो जाता है । 
" ॠदि - सिद्धि " उसके घर में स्थिर रहती है । यह श्री हरि का प्रिय बन जाता है । " श्री कृष्णः शरणं मम " एक महामंत्र है। जो इस मंत्र को जपता है उसको जीवन में सब कुछ मिल जाता है।

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 गीता के पाँच प्रसिद्ध श्लोक :------

1⚘ अजोऽपि सन्नव्यात्मा और अविनाशी होते हुए भी तथा सम्पुर्ण प्राणियों का ईशवर होते हुए भी अपनी  प्रकृति अधिन  करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। 

2.⚘यदा यदा कि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्यानमधम्रस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। हे भरतवंशी अर्जुन ! जब - जब धर्मकी हानि और अधर्म की वृद्धि होती है , तब - तब ही मैं अपने - आपको साकार रूप से प्रकट करता हूँ ।

3.⚘
 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्याय समयामि युगे युगे । 
 साधुओं- भक्तों की रक्षा करने को लिये , पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिये मैं युग - युग में प्रकट हुआ करता हूँ । 

4.⚘
 जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन 
 हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं  इस प्रकार  मेरे जन्म और कर्मको  जो मनुष्य तत्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है , वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता , प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है ।

5.⚘
  वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मदभावमागताः ।।  राग , भय और क्रोध से सर्वथा रहित , मेरे में ही तल्लीन , मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत - से भक्त मेरे भाव- ( स्वरूप ) को प्राप्त  हो चुके हैं । 
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गीता एक खाजाना है:----
गीता हमारे धर्म ग्रंथों का एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है। शास्त्रों का अवलोकन और महापुरुषों के वचनों का श्रवण करके मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि संसार में गीता के समान कल्याण करने के लिए कोई और उपयोगी ग्रंथ नहीं है। गीता में ज्ञान योग, ध्यान योग, कर्म योग, भक्ति योग आदि जितने भी साधन बतलाए गए हैं उनमें से कोई भी साधन अपने श्रद्धा और योग्यता के अनुसार करते रहने से मनुष्य का कल्याण हो सकता है। गीता उपनिषदों का अभी उपनिषद है। जीवन के विकास कलयाण के लिए प्रत्येक इन्सान को  प्रतिदिन गीता के एक अध्याय का पाठ जरूर करना चाहिए। 
  इसलिए अनुभव पुरुषों ने कहा कि गीता धर्म ज्ञान का एक कोष है। भगवत गीता एक असाधारण ग्रंथ है जिसके प्रत्येक धर्म का मनुष्य आदर के साथ पढ़ सकता है। इसमें अपने धर्म के तत्व देख सकता है।  यह तो संसार का एक अनमोल रतन है। इसके एक अध्याय में कितने रतन  भरे पड़े हैं । इसके पद,पद  और अक्षर अक्षर से अमृत की धारा बहती हैं ।

गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो मानव की उलझन को सुलझाने की प्रचंड शक्ति रखता है।  दुखियों का आधार है सोते को जगाने वाली एक जोत है, इसलिए जिसने भी गीता का अध्ययन किया उसका बेड़ा पार हुआ है, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है।
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