भगवान् को याद कैसे करें | सतसगं के कुछ अनमोल वचन | सतसगं सुनने के लाभ |

Tittle- भगवान् को याद और पुजा करने के लाभ-मनुष्य को शरीर केवल परमात्मा की प्राप्ति के लिए मिला है, किंतु वह अपनी भूल के कारण मानव अपने उद्देश्य से विमुख होकर धन, मान ,बड़ाई आदि नाशवान चीजों की तरफ बढ़ता चला जाता है। इसी कारण इन इन पदार्थों की प्राप्ति में अमूल्य धन और समय दुरुपयोग करने लगा जाता है।
इसी चक्कर में वह अपने जीवन को नर्क कर लेता है।
इन विपत्तियों से बचने के लिए सत्संग ही एक सुगम उपाय है। सत्संग मिलने पर मनुष्य का जन्म का उद्देश्य पहचान में आ जाता है। जीवन की उलझनों को सुलझाने के लिए सत्संग परम आवश्यक है।
मनुष्य को अपना जीवन और समय को अमूल्य समझकर उत्तम से उत्तम काम करने में व्यतीत करना चाहिए एक पल भी व्यर्थ नहीं बताना चाहिए। 
जीवन को अधिक खर्चीला नहीं बनाएं, ऋषि मुनियों का जीवन कभी भी खर्चीला नहीं होता था। अधिक खर्चीला जीवन बच्चों को रुपए और दूसरे पुरुषों का दास बना देता है।
, जिसके कारण उनके पास पाप करने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं रहता। और अन्त मे दुख भोगना पड़ता है। अपने बच्चों को हमेशा ऐसी शिक्षा दें कि अपनी चादर के अनुसार ही पैर पसारे, वरना जरूरत से ज्यादा खर्च करने पर और दूसरों की रीस करने पर चादर को फढ़ते देर नहीं लगती।

सतंसग की कुछ विशेष बातें--
सोते समय श्री भगवान के नाम रूप का याद स्मरण विशेष रूप से करना चाहिए जिससे कक्ष में सोते हो वहां पर धुप अगरबत्ती जरूर जलाये । सोते समय सांसारिक संकल्पों के प्रभाव को बुलाकर भगवान के नाम , गुण, प्रभाव और चरित्र का चिंतन करते ही सोना चाहिए.

*भगवान के सामने हमारे कोई भी गुण, दोष छिपे हुए नहीं है इसलिए अपने आपको राजा बलि की भांति भगवान के सामने समर्पण कर देना चाहिए।

*भगवतप्राप्ति के लिए मनुषय को पात्र बनना चाहिए, पात्र बनने पर भगवान शिव दर्शन दे सकते हैं। एकांत के समय को मूल्यवान बनाने के लिए संध्या, गायत्री, जप, ध्यान पूजा पाठ, स्तुति, प्रार्थना नमस्कार आदि के अर्थ और भाव को समझते ही निष्काम भाव से श्रद्धा भक्ति करनी चाहिए।


*स्नान और नित्य कर्म किए बिना दांत और जल के सिवा कुछ और ग्रहण नही करना चाहिए।

*श्री भगवान को भोग लगाकर उसके पश्चात ही खुद भोजन करें।

*तुलसी दल के सिवाय चलते फिरते खड़े हुए किसी भी चीज को कभी ना खाएं।

*भोजन करने के बाद आदि और अंत में आचमन करें ।

*जीव हिंसा को बचाते हुए चलें।

*घी, दूध, शहद ,तेल, जल आदि सभी तरल पदार्थ सभी छानकर काम में ले।

* सुख-दुख आदि के प्राप्त होने पर उनको भगवान का मंगल विधान समझकर हर समय पर हमे संतुष्ट रहना चाहिए।

*उत्तम काम को शीघ्र अति शीघ्र करने की चेष्टा करें क्योंकि शरीर का कोई भरोसा नहीं है।

*जहां तक हो मिल की बनी चीजें खाने में कम से कम उपयोग करे।

*ईश्वर की सत्ता पर प्रत्यक्ष से बढ़कर विश्वास रखें क्योंकि ईश्वर पर जितना प्रबल विश्वास होगा साधक भी उतना ही पाप से बचेगा और उसका साधन तीव्र होगा।

*परमात्मा की प्राप्ति के समान कोई और लाभ नहीं।

*सत्संग के समान कोई मित्र नहीं।

*कुुसंग के समान कोई शत्रु नहीं।

*दया के समान कोई धर्म नहीं।

*हिंसा के समान कोई पाप नहीं।

* ब्रह्मचार्य के समान कोई व्रत नहीं।

*ध्यान के समान कोई साधन नहीं।

* शांति के समान कोई सुख नहीं।

*ऋण के समान कोई दुख नहीं।

*ज्ञान के समान कोई पवित्र नहीं।

*ईश्वर के समान कोई इष्ट नहीं।

* गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं।

*गौ माता के समान कोई सेवा नहीं।

*गीता के समान कोई शस्त्र नहीं।

*गायत्री के समान कोई मंत्र नहीं।

* गोविंद के सामान कोई देव नहीं।

*संसार किसी भी प्रकार से अशक्ति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अशक्ति होने से अंत काल मे उसका संकल्प हो सकता है।

*संकल्प होने पर जन्म लेना पड़ता है।

*पैसा न्याय से ही पैदा करें, अन्याय से कभी नहीं, चाहे भूखा ही मरना पड़े।

⚘ईश्वर की भक्ति और धर्म को कभी छोड़े ही नहीं प्राण भले ही चले जाएं।

⚘दूसरों को दुख पहुंचाने के समान कोई पाप नहीं, और सूख पहुंचाने के समान कोई धर्म नहीं, इसलिए हर समय दूसरों के हित के लिए प्रयास करते रहना चाहिए।

⚘किसी का उपकार करके उस पर अहसान ना करें, ना किसी से कहे और ना मन में अभिमान करें,
नहीं तो किया हुआ उपकार क्षीण हो जाता है।ऐसा समझे सब कुछ भगवान ही करवाते हैं मैं तो सिर्फ निमित्त मात्र हूं।

⚘एकांत में भगवान के आगे करूणा भाव से स्तुति, प्रार्थना करने से भी श्रद्धा बढती है।

⚘गंगा स्नान, गो की सेवा, अर्थ सहित गीता का अभ्यास, गायत्री का जप और गोविंद का ध्यान इनमें से किसी एक का भी निष्काम भाव और श्रद्धा भक्ति पूर्वक सेवन करने से कल्याण हो सकता है।

⚘हर समय संसार और शरीर को काल के मुख में देखें।

स्त्री के लिए पतिव्रत धर्म ही सबसे बढ़कर धर्म है, इसलिए भगवान को याद रखते ही पति की आज्ञा का पालन विशेष रूप से करना चाहिए।

पति के और बड़ों के चरणों में नमस्कार करना सबसे बड़ा धर्म समझना चाहिए यह उसकी सबसे बड़ी सेवा है।

ऐसा समझने वाले की लक्ष्मी मेरी है, पर लक्ष्मी भगवान राम की है, ऐसा समझने से लक्ष्मी उनको ठुकरा देती है।और उसको भगवान् का मनाने वालों का उदार करती है।

परमात्मा व्यापक है तुम्हारे अंदर भी है, पास की चीज को दूर देखो तो ढूंढने से देर लगेगी।

भाग्य को सिर्फ कर्म हीन व्यक्ति ही कोसते हैं।

प्रभु के न्याय मे देर भी नहीं है और अंधेर भी नहीं है।

धैर्य से आज भी नहीं मिला तो क्या हुआ, कल तो अवश्य मिल जाएगा यही तो सबसे बड़ा सुख और आनंद है।

ईमानदारी के साथ पूरी मेहनत से काम करते रहने पर, अगर आपको पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं है हो रही तो समय देना चाहिए, क्योंकि पहले जन्म का कर्म ही आज के जीवन को प्रभावित कर रहा है।

दुख से भी घर को त्यागने की कभी नहीं सोचना चाहिए घर से ममता का और आसक्ति का त्याग करके घर को भगवान का घर मानकर भगवान का स्मरण हालमें कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए।

इसलिए जो लोग इन बातों को और धर्म धर्म और शास्त्रों की बातों को मनाते हैं, वह कभी दुखी नहीं हो सकते। वह थोड़ा होते हुए भी हमेशा सुखी रहते हैं वरना लोग मैंने महलों में भी दुखी रहते हुए देखे हैं।

किसी को बुरा ना समझना, किसी का बुरा ना चाहना, और किसी को बुरा ना करना यह भगवती प्राप्ति का सुगम साधन है।

जब बालक जन्म लेता है, वह बड़ा होगा कि नहीं, पढेगा के नही, उसका विवाह होगा कि नहीं ,उसके बच्चे होंगे कि नहीं ,उसके पास धन होगा कि नहीं, वह सुखी रहेगा कि नहीं, इन सब बातों का हम सब संदेह करते है, पर वह मरेगा नहीं इसमें कोई संदेह नहीं।

आप भगवान को नहीं देखते पर वह आपको निरंतर देख रहा है। आप उसे कुछ नहीं देते पर वह हजार हाथों से आपको दे रहा है फिर भी आप को संतोष नहीं तो फिर दोष किसका।

इसलिए जो भी भगवान ने हमें दिया है उसमें खुश रहें और उसकी रजा में राजी रहे, क्योंकि वह देते समय देर नहीं लगाता हो सकता है आप एक चम्मच लेकर खड़े हो वह लुटिया भर कर देने को तैयार हो।

अपने बच्चों और परिवार को इस तरह के संस्कार देने से वह कभी भी गलत राह पर नहीं जा सकता। अगर फिर भी जाता है तो इस बात का कभी मलाल नहीं रहेगा कि मैंने अपने बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दिए।

अगर आपको यह सत्संग की बातें अच्छी लगी हूं और आपके किसी के काम आने वाली हूं तो प्लीज इन्हें शेयर जरूर करें।

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