गीता के ज्ञान महत्व | गीता हमें कया सिखाती है | गीता हमें कया संदेश देती है |

धार्मिक ग्रंथ गीता का महत्व-
गीता हमें क्या सिखाती है-

जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो, तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया, तुमने क्या पैदा किया था जो नष्ट हो गया है, तुमने जो लिया यहीं से लिया तुमने जो दिया यहीं पर दिया, जो आज तुम्हारा है कल किसी और का था, परसों किसी और का हो जाएगा, परिवर्तन ही संसार का नियम है ,जिसे तुम मृत्यु समझते हो वही तो जीवन है, न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो,

 यह अग्नि जल वायु पृथ्वी और आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परंतु आत्मा स्थिर है तुम अपने आप को भगवान को अर्पित करो यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय चिंता और शोक से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है

गीता की  जीवन मे उतारने वाली विशेष बातें- 

संसार के मोह के कारण मनुष्य में क्या करूं इस दुविधा में फंस कर दुविधा में पड़ जाता है। अतः मोह या सुख शांति के वशीभूत नहीं होना चाहिए। शरीर नाशवान है उसे जानने वाला शरीरी अविनाशी है। इस विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना इन दोनों में से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिंता शोक मिट जाते हैं। निष्काम भाव से केवल दूसरों के हित के लिए अपने कर्तव्य को निभाते रहने से आप का कल्याण हो जाता है।
कर्म बंधन से छूटने के दो उपाय हैं। कर्मों के तत्व को जानकर निस्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्वज्ञान का अनुभव करना। मनुष्य को अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर सुखी दुखी नहीं होना चाहिए। इनसे सुखी दुखी होने वाला मुझसे संसार से ऊंचा उठकर परम आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। किसी भी साधन से अंतकरण में समता आने चाहिए। संमता आए बिना मनुष्य सवर्था निर्विकार नहीं हो सकता । सब कुछ भगवान का ही है ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है। अंतकालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है। अतः मनुष्य को हर दम भगवान का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। जिससे अनंत काल में भगवान की याद बनी रहे सभी भगवत प्राप्ति के अधिकारी हैं। चाहे वह किसी भी जाति धर्म ने देश के क्यों ना हो। संसार में जहां विलक्षणता, विशेषता, सुंदरता, महता,  बलवता आदि दिखे, उसको भगवान का ही मानकर का चिंतन करना चाहिए। इस जगत को भगवान को स्वरूप मानकर प्रत्येक मनुष्य को भगवान के विराट रूप के दर्शन कर सकता है। जो भगत शरीर,  इंद्रियां, बुद्धि से भगवान को अर्पण कर देता है भगवान को बहुत प्यारा होता है। संसार में परमातत्व ही  जानने योग्य है। उसको जाने पर ही अमरता की प्राप्ति हो जाती है।

संसार बंधन से छूटने के  लिए सत्व, रज , तम इन तीनों गुणों से अतीत होना जरूरी है। इस संसार का मूल आधार और अत्यंत श्रेष्ठ परम पुरुष एक परमात्मा ही है। ऐसा मानकर अंतर्मन से उनका भजन करना चाहिए। बुरे विचारों और दुराचार के कारण हमेशा मनुष्य  84 लाख योनियों और नरक में जाता है, और दूख पाता है ।अतः जन्म मरण के चक्कर से छूटने के लिए बुरे विचारों को त्याग करना आवश्यक है।
मनुष्य को श्रद्धा भाव से जो भी शुभ कार्य करें उसको भगवान का स्मरण करके उसका नाम समरण  करते ही आरम्भ  करना चाहिए।  सब ग्रंथों का सार वेद है, वेदों का सार उपनिषद है ,उपनिषदों का सार गीता है ,और गीता का सार भगवान की शरणागति है। जो इंसान अंतर्मन से भगवान की शरण हो जाता है उसे भगवान संपूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं। इसमें किसी भी प्रकार की शंका  नहीं है।

गीता ज्ञान और भगवान श्री कृष्ण की बातें- 

गीता ज्ञान का भक्ति का कर्तव्य का भाव का प्रेम का प्रभु से मिलने का एक ऐसा महासागर है जिसकी गहराई का रहस्य का किसी का भी पूर्ण ज्ञान होना आज तक भी किसी को प्राप्त नहीं हुआ। नित्य नए-नए भाव व नया ज्ञान पैदा होता है। जितना गहरा गोता मारेंगे उतना ही ज्यादा आनंद ,शांति और ज्ञान की प्राप्ति होगी। गीता का केंद्रीय एक भाव यही है कि तुम निरंतर कर्म करते रहो परंतु उस कर्म में आसक्त मत हो। उसके अच्छे या बुरे फल को प्रभु नारायण को अर्पण कर दो। 

शुभ और अशुभ तो प्रत्येक कर्म में दोनों छिपे हुए होते हैं, उनको देखने की चेष्टा मत करो ।किसी को भी मेरा है, मेरी है, मत कहो पूर्ण निश्चय  से पूर्ण श्रद्धा से मानो गीता हारे हुए मनुष्य में भी हिम्मत पैदा करती है और सद्गुणों से भर देती है। गीता को जितनी बार पड़ेंगे उसकी जितनी भी गहराई में हम जाएंगे। हमें और ज्यादा आनंद ,शांति और तृप्ति मिलेगी। गीता का हर घर में प्रचार होना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य के रोम-रोम में, समस्त जातियों, समस्त धर्मों, समस्त प्राणियों के लिए गीता बहुत बड़ा हीरा है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा कि कर्म कभी मत छोड़ो, कर्म ना करने से घोर पाप लगेगा, कर्म करते रहो, मैं संपूर्ण जगत का मालिक हूं ,प्रभु हूं, मुझे जगत से प्रेम है ,मैं भी काम करता हूं, मुझे किसी भी कर्म से, किसी भी प्रकार का लाभ नहीं, तो भी मैं कर्म करता हूं, एक दिन भी एक क्षण के लिए भी कर्म करना बंद कर दूं , तो संपूर्ण जगत ही नष्ट हो जाएगा।

 भगवान श्री कृष्ण की इस वाणी से यह सिद्ध हो जाता है कि यह सब जो  नियमित अनियमित जो भी हो रहा है वह अपने आप नहीं हो रहा है। प्रकृति को स्वयं कृष्ण  भगवान चला रहे हैं।
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा कि जो भगत जिस जिस देवता रूप की पूजा करने की इच्छा रखता है, मैं उस उस देवता में ही उस भगत की श्रद्धा  को स्थिर कर देता हूं।  वह भकत सरदा से युक्त वह उस देवता के पूजन की चेष्टा करता है और परमात्मा के निश्चित प्रक्रिया अनुसार उस देवता से अपनी इच्छा अनुसार  भोगों को प्राप्त करता है,क्योंकि इन सब में मैं ही वास करता हूं। मेरे अनेक रंग, अनेक रूप, अनेक नाम है ।
भक्त जो भी रंग ,जो भी रूप ,जो भी मुहूर्त, जो भी नाम जो, भी मुरत, जो भी उसको अच्छा लगता है, उसी को भजन कर सकता है।
श्री कृष्ण भारत के उन विशिष्ट लोगों में से एक थे जिन्होंने देश को नैतिक सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से उत्पन्न बनाने के लिए हर तरह उन्नत बनाने के लिए भरसक प्रयास किया

गीता जैसा ज्ञान दिया किंतु खेद है कि देश में उनके उपदेश  को जीवन में उतारा नहीं।
भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि निष्क्रिय होकर बैठे रहना हमेशा अधर्म है,और अन्याय कर रहे अपने सगे बंधु बांधव को दंड देना धर्म है, श्री कृष्ण द्वारा गीता में दिए गए उपदेश केवल एक धर्म विशेष करने के लिए नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए है। गीता में भगवान ने अपनी सारी कृपा उड़ेल दी हैं। गीता कोई एक मजहब या पंथ का ग्रंथ नहीं यह मोक्ष प्राप्ति का ग्रंथ है। गीता मानव जीवन को सार्थक बनाने वाली विद्या से परिपूर्ण ग्रंथ है। मनुष्य की मांग है कि सदा सुखी रहू, लेकिन गलती यह होती है कि जो भी चीजें सदा रहेगी नहीं उनमें वह सुख खोजने लगता है। मानव को ईश्वर की सुंदर और कृपया मानो जहां अपने-अपने कलाकार की कलाकारी होता है। उसका मार्ग दर्शन पाकर उसकी बराबरी कर सकता है।
भगवान राम ने ब्रह्मा जी से कहा कि जब यह संसार नहीं था, तब भी मैं था, और अब जब यह संसार है तभी मैं हूं, यह मेरी माया का चमत्कार है ।यह माया की जादूगरी है। भगवान की माया शक्ति असली भगवान को छुपा देती या नकली संसार को दिखा देती है। सिर्फ इनकी बातें समझ नहीं पाती। जिनकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ उन्हें तो श्री कृष्ण सामान्य दिखेंगे क्योंकि इंद्रियों से जो दिखता है वह उन्हें सच्चा लगता है ।

कृष्ण का जीवन-

कृष्ण का जीवन की दुखों की बहुत  लंबी कहानी है ।उनके दुखों की आगे तुम्हारा दुख कुछ भी नहीं है। जन्म कारावास में हुआ, अपने ही  विरोधी निकले, मगर उन्होंने अपने को दीन हीन कभी नहीं समझा, श्री कृष्ण हर अवस्था में मुस्कुराते रहें। 
इसी तरह  मनुष्य को भी
जीवन की सारी परेशानियों के बीच रहकर भी चिंता, मधुरता बनाए रखना हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए। कृष्ण का अर्थ है जो सबको आकर्षित करें, मित्र को भी शत्रु को भी, ऐसा ही जीवन तुम्हारा भी होना चाहिए। वास्तव में तुम भी श्री कृष्ण से कम नहीं।  तुम भी  महावीर , बुद्ध से किसी से कम नहीं। मगर शरीर को अपना मान बैठे हो जगत को सच्चा मान लिया तभी दुर्भाग्य करम हो गया।
संसार की ओर आकर्षित हो रहे हो, आपके मन को अपनी और आकर्षित करने के लिए जो अवतार हुआ है, उसी का नाम कृष्ण है।
श्री कृष्ण भगवान सिर्फ 6 दिन के ही हुए थे कि उन्हें जान से मारने के लिए कंस मामा ने पुतना को जहर पिलाने के लिए भेजा, द बकासुर,  धेनूकासुर , सकटा आदि को भेजा मगर सभी बालकृष्ण के हाथों मारे गए।
जो मनुष्य भगवान श्री कृष्ण जी का निष्ठावान भक्त है, वह नित्य गीता को पढ़ता है, भजन करता है उसके ऊपर किसी भी प्रकार का मारण मंत्र या टोटका काम नहीं करता ।
उस मनुष्य का कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, बल्कि अशुभ करवाने वाले का ही अशुभ होगा। श्री कृष्ण नाम जपते रहने से यमराज भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
श्री कृष्ण शरण़ मम
इस मंत्र का जो कोई जाप करता है उसके सभी रोगों का शमन व सभी पापों का नाश हो जाता है,व रिद्धि सिद्धि उसके घर में सिथर रहती है। वह श्री हरी का प्रिय बन जाता है। गीता की हर एक बात हर एक वचन  हीरे के समान है।  जिसने इंन बातों को अपना लिया उसने अपने जीवन की नैया को पार लगा लिया।

महापुरुषों की दृष्टी से गीता का महत्व-


गीता हमारे धर्म ग्रंथों में एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है । (लोकमान्य तिलक )

शास्त्रों का अवलोकन और महापुरुषों के वचनों का श्रवण करके मैं इस निर्णय पर पहुंची हूं कि भगवत गीता के समान कल्याण करने के लिए कोई भी और दूसरा ग्रंथ नहीं है। 

गीता में ज्ञान योग ध्यान योग कर्म योग भक्ति योग आदि जितने भी साधन बतलाए गए हैं उनमें से कोई भी साधन अपनी श्रद्धा रुचि और योगता के अनुसार करने से समस्या का शीघ्र ही कल्याण हो सकता है । (जयदयाल गोयन्का)

गीता हिंदू दर्शन और नीतिशास्त्र के सबसे प्रामाणिक ग्रंथों में से हैं और सभी धर्मों ने उसे रूप में स्वीकार किया है।

गीता उपनिषदों का भी उपनिषद है। जीवन के विकास के लिए आवश्यक प्रत्येक विचार गीता में आ गया है। इसलिए अनुभवी पुरूषों ने कहा कि गीता धर्म ज्ञान का एक भंडार है।  (चक्रवर्ती राजगोपालाचारी)

भगवत गीता ऐसा ऐसा ग्रंथ है जिसे हर धर्म का  मनुष्य आदर से पढ सकता है, और इसमें अपने धर्म को तक देख सकता है ।  (सतं  विनोबा)

गीता संसार का अनमोल रतन है।

इसके हर अध्याय में कितने-कितने रतन भरे पड़े है।  इसके पद पद ,अक्षर अक्षर  से अमृत की धारा बहती है। (मालवीय)

गीता धर्म दर्शक कोष है, आत्मा की उलझन को सुलझाने वाली यह एक बहुत बड़ी प्रचंड शक्ति  तथा दीन दुखियों का आधार है।
(माहात्मा गाँधी )

गीता में 17 अध्याय हैं और 700 श्लोक हैं गीता जी का प्रत्येक अक्षर हीरे से भी ज्यादा कीमती है और उपयोगी है।

मनुष्य मात्र चाहे वह किसी भी धर्म का हो सभी का कल्याण और इस संसार में उदार कर देने वाला है। गीता साक्षात भगवान्  कृष्ण जी प्रभु के मुख से निकले हुए वचन हैं। 

जीवन को बदलने वाला गीता ज्ञान  -
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क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता ।है विवेक के नष्ट हो जाने से मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और समृति के भ्रमित हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य नष्ट हो जाता है। 
कर्मों के फल में आसक्ति नहीं रखने वाला सदा संतुष्ट रहता है जिसने अपने मन को वश में कर लिया उनका यह मन मित्र हो जाता है और जिसने अपने मन को वश में नहीं किया उसका मन उसका शत्रु बन जाता है। ध्यान अंत समय में जिस स्वरूप ध्यान करते हुए शरीर को त्यागता है वह उसी रूप में स्वरूप को प्राप्त होता है।
गीता एक अलौकिक रचना स्वयं श्री कृष्ण भगवान के मुख से निकले हुए वचन हैं। अलौकिक रत्न इसमें  में भरे पड़े हैं।  गीता को बार-बार पढ़ते जाएंगे तो प्रभु के साक्षात दर्शन भी आपको हो सकते हैं। गीता केवल हिंदू धर्म का ग्रंथ नहीं है सारी मानव जाति को मानवता की शिक्षा है मानव मात्र के लिए मुक्ति का सरल मार्ग है । ईश्वर से जुड़ने के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा।
गीता को नित्य पढ़ने से भगवान के साक्षात दर्शन हो सकते हैं। यह एक बहुत बड़ा सत्य है, बस जरूरत है इसको विश्वास और भाव  के साथ पढ़ने की।
यह बहुत सारे साधु-संतों और महान पुरुषों का निजी अनुभव है। 

 गीता के 5 ऐसे श्लोक जो अर्जून को समझायें गये थे  -

1. मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा संपूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपने प्रकृति को अधीन करके अपने योग माया से प्रकट होता हूं।


2. हे भारतवंशी अर्जुन जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तक ही मैं अपने आप को साकार रूप में प्रकट करता हूं।

3.  साधुओं की रक्षा करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली-भांति स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं.

4. हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता अर्थात दृढ़ता पूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्यूत मुझे ही प्राप्त होता है।

5.  रोग , भय,  क्रोध से सर्वथा रहित, मेरे में ही तत्लीन,  मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत से भगत मेरे भाव को प्राप्त हो चुके हैं।

गीता  हमें कया सिखा रही है ?
यह मानव जीवन के एकमात्र लक्ष्य, भगवतप्राप्ति का शहज साधन है।  गीता का कथा का श्रवण, मनन, चिंतन भक्ति मानव जीवन को भगवत पुराण बनाने वाला ग्रंथ है। यह गीता ग्रंथ काल के भय से मुक्त कराने वाला ग्रंथ है।यह मृत्यु को मंगलमय बनाने वाला ग्रंथ है। गीता आध्यात्मिक रस वितरण की सार्वजनिक प्याऊ है। गीता समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है। गीता सभी पुराणों में सर्वोपरि है, इसलिए श्रीमद् शब्द से तिलक से इसे अलंकृत किया गया है।  भागवदगीता भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकला हुआ समस्त प्राणियों के लिए अनमोल खजाना है।

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