बसंत ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार कया खाये और कया न खाये | how to eat according to spring season |

बसंत ऋतु के अनुसार कया खाये और कया न खाये-भारत देश की विशेषता कि यहां सारा साल मौसम बदलता रहता है हमारे देश में छह ऋतुऐ आती हैं। यहां बहुत ज्यादा सर्दी भी होती है और बहुत तपने वाली गर्मी भी ,फिर उसके बाद वर्षा, और फिर ना गर्मी ना सर्दी वाला मौसम भी आता है। इस मौसम को हम ऋतुराज भी कहते हैं क्योंकि इस ऋतु में ना अधिक सर्दी पड़ती ना अधिक गर्मी। अंग्रेजी महीने के अनुसार यह मौसम मार्च और अप्रैल में होता है। इसमें बसंत पंचमी और होली जैसे त्योहार शामिल होते हैं और धरती को देखकर  ऐसा लगता है जैसे भगवान ने फूलों की बरसात कर दी हो। कई तरह के रंग-बिरंगे नए-नए फुल, कोमल पत्तियां, आम के बौर, यह सभी हम सबके लिए स्वास्थ्य वर्धक भी माने जाते हैं। इसलिए इस समय को ऋतुराज यानी जिसे हम बसंत ऋतु भी बोलते हैं।इसी प्रकार ऋतुओं के अनुसार ही हमारा शारीरिक बल भी कम या ज्यादा होता है । 


* प्रकृति स्वयं चिकित्सक है - 

 प्रकृति • अपने बदलाव के साथ ही यह सब प्रदान करती है जिसक आवश्यकता होती है , केवल समझने मात्र की आवश्यकता होती है । ऋतुओं के अनुसार अपने शारीरिक बल को जान कर आहार विहार अपनाएँ तो हम स्वस्थ रह सकते हैं । 

अब समय बसन्त ऋतु का है । बसन्त प्रकृति और मानव जीवन में उत्साह , उल्लास और प्रेरणा भरने की ऋतु है । इस ऋतु से सारे विश्व में नवजीवन का संचार होता है । सारी प्रकृति नवयौवना की भान्ति सुंदर दिखाई देती है । प्रकृति में सर्वत्र बसन्ती रंग फैला हुआ दिखाई देता है । शिशिर ऋतु से ही आदान काल आरम्भ हो चुका है लेकिन अभी तक शीतकाल पूर्णतः समाप्त नही हुआ है । ग्रीष्मकाल आरम्भ हो रहा है । अतः यह ऋतु सन्धि का समय है । इस ऋतु को ऋतुराज भी कहा जाता है । 


बसंत ऋतु का समय : -

बसन्त ऋतु का आगमन मधु ( चैत्र ) तथा माधव ( वैशाख ) के महीनो में होता है । प्राचीन परम्परा के अनुसार इस ऋतु का आरम्भ माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी ( बसन्त पंचमी ) से ही माना जाने लगा है । इस ऋतु में सूर्य का बल बढ़ने और चन्द्र का बल घटने लगता है जिस से शरीर में जलीयांश की कमी होने लगती है और रूक्षता बढ़ती है ।

कफप्रकोप - चरक संहिता के अनुसार इस  हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ बसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से द्रवीभूत होकर जठराग्नि को मन्द कर देता है अतः अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं । उस संचित कफ को दूर करने के लिए वमनादि पंचकर्म कराने चाहिए । 

 सुश्रुत के अनुसार- शीतकाल में संचित हुआ कफ बसन्त ऋतु में , सूर्य की प्रखर होती किरणों से पिघल कर प्रणियों के शरीर में श्लैष्मिक ( कफ जन्य) रोग पैदा करता है ।

वसन्तो मधुरः स्निग्धं श्लेष्मवृद्धि करश्च सः  बसन्त में मधुर , स्निग्ध तथा श्लेष्म ( कफ ) की वृद्धि होती है । 

सम्भावित रोग :- इस ऋतु में प्राकृतिक रूप से कफ कुपित रहता है जिस से कफज रोग उत्पन्न होते है जैसे सर्दी , जुकाम , खांसी , श्वास आध्यमान , कब्ज , पेट दर्द आदि । रोग , कफ ज्वर , Tonsillitis , वमन , अरुचि , हितकर आहार विहार बसन्त ऋतु में ध्यान देने की आवश्यकता है कि इस ऋतु में मौसम में उतार - चढ़ाव और परिवर्तन होता रहता है इसलिए  इस ऋतु में ताजा , सुपाच्य और हल्का आहार लेना चाहिए। 

 एक वर्ष पुराना जौ , गेहूं तथा चावल का प्रयोग करना चाहिए ।

 छिलके वाली मूंग की दाल , मसूर , अरहर , चना की दाल उपयोगी हैं।

* हरी शाक सब्जी , शहद , अदरक मौसमी फल , रुखे एवम् गरम प्रकृति के कटु रस वाले पदार्थ का सेवन करना चाहिए।

* समय नीम की नई कोंपलों  5 ,6 का प्रतिदिन सेवन करना चाहिए । इससे शरीर में रक्त शुद्ध होता है ।

* शरीर संशोधन करना चाहिए । वमन , जलनेति , नस्य , कुञ्जल आदि क्रियाएं करने का यह उत्तम समय है । 

*इस ऋतु में परिश्रम , व्यायाम आदि अवश्य करना चाहिए ।

*रसायन , औषध व मधु के साथ हरीतकी का चूर्ण का प्रयोग करना चाहिए ।


* मालिश का प्रयोग इस ऋतु में विशेष लाभप्रद है । आयु और बल के अनुसार व्यायाम या योगासनों का अभ्यास करना चाहिए ।


बसंत ऋतु में अहितकर आहार विहार - बसन्त ऋतु में जठराग्नि मन्द होती है इसलिए : गुड़ शक्कर या मीठे पदार्थों का सेवन बहुत कम मात्रा में करना चाहिए । 

नवीन अन्न , शीतल , स्निग्ध , भारी , अम्ल , मधुर द्रव्य , दही , उड़द , आलू , प्याज , गन्ना , नवीन गुड़ , भैंस का दूध व सिंघाडे का सेवन नहीं करना चाहिए ।

बसंत ऋतु में ओवर डाइटिंग से बचना चाहिए जब भूख लगे तभी खाएं।

 दिन में सोना , एक स्थान पर अधिक समय तक बैठना उचित नहीं है । इस प्रकार किसी भी वस्तु का सेवन अगर ऋतु अनुसार युक्ति पूर्वक किया जाए तो वह शरीर को बलवान व नीरोग करती है , वरना वही रोग उत्पति का कारण बन जाती है । अतः प्रकृति को समझते हुए अपने स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए । इस प्रकार बसंत ऋतु में निरोग रहकर इस मौसम का आनंद लिया जा सकता है ।


निष्कर्ष- अक्सर ठंड की जाने के बाद और ठंड शुरुआत होते ही हर साल मौसम में बदलाव आने की वजह से हमें बीमारियां अक्सर घेर लेती हैं फिलहाल बसंत ऋतु की शुरुआत हो चुकी है।  गर्मी धीरे-धीरे बड़ रही है ,हालांकि मौसम में बहुत कम ठंड हो रही है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इस समय कफ दोष बढ़ने लगते हैं। जिसकी वजह से इस मौसम में अग्नि तत्व में कमी आने लगती है और शरीर में डाइजेशन ठीक से ना हो पाने के कारण समस्या बढ जाती हैं। अगर आप भी इस मौसम में अपने आप को अनहैलदी  महसूस कर रहे हैं तो इस तरह की समस्या से जूझ रहे हो तो परेशान ना हो।  इस मौसम के अनुसार ही अपने स्वास्थ्य पर ध्यान रखें और ऊर्जा से भरपूर रहने के लिए अपनी डाइट में मौसम के अनुसार खाना खाएं ,क्योंकि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

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