परमात्मा के दर्शन कैसे करें || खुद को कैसे जाने, मै कौन हूँ || ||meditation benefit||


Tittle- स्वयं को पहचानो मै कौन हूँ ?  आज मैं आपके साथ स्वयं को पहचानो के बारे में अपना अनुभव  शेयर कर रही हूं, कि मैं कौन हूं ,इस दुनिया में किस लिए आया हूं ।यह जानना हम सबके बहुत जरूरी है कि भगवान ने मुझे धरती पर किस मकसद के लिए भेजा है आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
मै कौन हूँ-
अपने आपको देखने के लिए जगत को देखना बंद करना पड़ेगा। आत्म चिंतन से भिन्न सभी चेतना से जगत को देखना है इसलिए बाहर का पट बंद कर के अंदर के पट खोलें अपने अंदर के नेत्र खोलने पर मनुष्य को वह धन मिलता है जिसे पाने के बाद कुछ और पाना शेष नहीं रह जाता। जिसे चोर चुरा नहीं सकते, डाकू छीन नहीं सकते और सगे संबंधी बाँट  नहीं सकते। यह धन  एक बार मिलने के पश्चात कभी अलग नहीं होता। यदि आप आहार-विहार को शुद्ध करके अपने चित्त वृत्ति को ब्रह्मा प्रपंच से मोड़कर आत्मचिंतन करना आरंभ करें तो शीघ्र ही आपको अपने अंदर ही वह धन व आनंद मिलेगा जो कभी भी समाप्त नहीं होता। जब तक संसार में नहीं पहुंचेगा तब तक तन को चैन नहीं और मन जब तक भगवान से नहीं मिलेगा तब तक मन में चैन नहीं कहने का भाव यह है कि शरीर भौतिक तत्वों का पुतला है इसलिए जब तक यह भौतिक तत्वों में नहीं मिलेगा तब तक इस की यात्रा चालू रहेगी और मन भगवान का अंश है। इसलिए जब तक भगवान से नहीं मिलेगा तब तक इसे भी शांति नहीं मिलेगी ।आतमबोध मानसिक रोगों की अचूक एवं स्थाई औषधि है। साधक को चाहिए कि जगत के मित्यातव तथा आत्मा के सच्चिदानंद स्वरूप और उसकी अजरता , अमरता के विषय में हमेशा चिंतन करें। ऐसा करने से जगत का मितव्ययता तथा आत्मा की नित्यता का बोध पक्का हो जाता है, और यही है आंतमनिष्ठा है।   
हमेशा अपने आप को देखो,
 देखो मैं क्या हूं , किन गुणों धर्म वाला हूं , किंतु देखो ओढनी उतार कर अर्थात शरीर की असलियत को जानने के लिए वस्त्र आभूषण हटाकर देखना चाहिए। जैसा ही नाम ,रुप ,जाती पद, तथा देह , इंद्रिय आदि का वर्णन उतार कर खुद को देखना  चाहिए।  इन सब को उतारने के लिए अर्थात अलग करने से केवल मात्र अपने आप ही शेष रह जाता है। बस उनको देखना है । अपने आप को जानना है तो स्वयं को पाना है।
 भगवान महावीर ने कहा है जीवन में यदि कुछ मूल्यवान है तो वह है स्वयं  को मूल्य। स्वयं के मूल्य से बढ़कर दुनिया में कुछ और हो ही नहीं सकता।
 जो उसे प्राप्त कर लेता है वह सब कुछ पा लेता है और जो उसे खो देता है वह सब कुछ खो देता है । यह मालामाल होने की कसौटी है स्वयं को पा लेना और कंगाल होने की कसौटी है स्वयं को खो देना।  यदि किसी ने स्वयं को खो कर दिया जगत के सारे ऐश्वर्या, वैभव, पा लिया समझना उसने बड़ा महंगा सौदा किया ।है वह हीरे मोती देकर कंकड़ पत्थर ले आया है ।

श्री कृष्ण जी श्री भगवान जी यह कह रहे हैं कि तुम देह को  मैं मानना छोड़ दो, तब मैं तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊंगा, किंतु जब तुम स्वयं को मैं मानोगे तो मैं अंतर्ध्यान हो जाता हूं। मैं तब रहता हूँ जब तुम नहीं रहते। मैं तो कहता हूं, जब तुम नहीं रहते, तब मैं नहीं रहता। प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण तत्व है , लेकिन वह देह को मैं मानता है,  इसलिए गड़बड में पड़ जाता है। यदि आत्मा को मै  माने तो आप का ही नाम कृष्ण  है।  वास्तविक मैं को पहचान लो। वह तो अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त है, कभी बिगड़ नहीं सकता। हम यदि कार्य करते समय स्वयं को करता ना माने, भोग भोगते हुए स्वयं को नित्य शुद्ध तो निराकार परमात्मा श्री कृष्ण के अंतरकरण में प्रकट हुआ है, वही सच्चिदानंद स्वरूप हमारे अंतर्मन प्रकट हो सकता है।
 अपने व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए प्रत्येक के लिए आवश्यक है कि वह आतम लोकन कर अपनी क्षमताओं तथा अपनी कमियों को सही स्वरूप से मूल्यांकन करें।
 वास्तव में आत्मावलोकन बड़ी शक्ति है। जिससे मनुष्य अपने खुद  विकास कर सकते हैं।  जिस वयक्ति को स्वयं  पर विश्वास नहीं होता निस्संदेह उसमे आत्मविश्वास की कमी होती हैं।  आत्मविश्वास की कमी काम करने की इच्छा और क्षमता  दोनों को प्रभावित करती हैं।  विश्वास ही आपका काम करने के लिए प्रेरित करता है यही सफलता की कुंजी है। अपना विकास  करने के लिए सबसे पहले आपको अपनी क्षमता पर विश्वास करना होगा।  धैर्य,संयम तथा सकारात्मक सोच से अगर आप अपनी कमजोरियों को पहचान कर उन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे तो निसंदेह सफलता प्राप्त हो सकती है। असफलताओं के बावजूद अपनी पिछली गलतियों को पहचान कर उन्हें दूर करने का बार-बार प्रयास करें, सफलता अवश्य मिलेगी। आप जितना कठोर प्रयास करेंगे उतने ही अधिक भाग्यशाली होंगे अपनी असफलताओं को दोष दूसरों के सिर पर मढ़ने की  बहुत लोगों की आदत होती है, इससे भी अधिक कुछ लोग भाग्य को सफलता का दोषी करार देते हैं। जबकि यह बहुत बड़ी मूर्खता है। ऐसे व्यक्ति अपनी कमजोरियां और गलतियों का आकलन न करके और अधिक पनपने मे मदद करते है।

हमारे अंदर एक महान शक्ति है- -----
 कर्म भी निराले हैं कर्म ही हमें   लोगों से  मिलता है और इसी  कारण हम  लोगो से  बिछुडते  हैं । यही कर्म  किसी को दुर्बल बनाता है और कुछ लोगों को बलवान,  किसी को धनी बनाता है, और किसी को निर्धन संसार के सभी संघर्ष चाहे जो भी हो कर्म के भी बंधन है। जिंदगी में जिंदगी से अधिक मूल्यवान कुछ भी नहीं है। दुनिया में हर पदार्थ की कीमत जिंदगी से होती है ।लेकिन दुर्भाग्य है कि हर वस्तु की कीमत आंकने वाला मनुष्य जीवन के अंतिम क्षण तक अपनी कीमत नहीं आंक पाता  है। 
 यही मनुष्य 33 करोड़ देवी देवताओं का विश्वास कर लेता है,  लेकिन अपने आप पर विश्वास नहीं कर पाता है। हर मनुष्य में यह क्षमता होनी चाहिए जो की संत राम, कृष्ण, बुध और महावीर में थी ,यही  क्षमता मुझ में भी है।
 हमारे दिमाग से विद्युतधाराओं के समान विचार शक्ति की तरंगे निकलती हैं, हम ऐसी भावनाएं जिसके प्रति व्यक्त करते हैं हमारी विचार तरंगे जीवित शक्ति के रूप में उसके पास जाकर प्रभावित करती हैं। दृढ़ संकल्प शक्ति से कल्याणकारी विचार, मंगलकामनाएं, मंगल कार्य, करते हैं मनुष्य अपने विचारों और संकल्प को शुद्ध बनाकर महान कार्य कर सकते हैं, इसमें किसी भी प्रकार का शकां नहीं है, लेकिन दृढ़ संकल्प करना चाहिए। अपने मन में निरंतर लोकहित की कामना का संकल्प करते रहें ।आपके अन्दर  दिव्य शक्तियों का संचार होगा और आप लोग कल्याण करने में यशस्वी होंगे।
 बुराईयों कैसे खत्म करे-

अगर आपके अंदर किसी भी प्रकार का नशा छोड़ने की इच्छा है,तो संकल्प करो सुबह उठकर दोनों हाथों को देखो 5 बार मन ही मन कि  आज से मैं अपने मुंह में बीड़ी, सिगरेट, शराब आदि विषैले पदार्थ नहीं डालूंगा। कोई भी नशीली चीज नहीं खाऊँगा।   स्नानादि के बाद कटोरी में जल लेकर अपने माथे पर उसी जल का तिलक करो और दृढ़ संकल्प करो कि अब मैं अपना भाग्य बदल रहा हूं,  सवा सौ बार इस  तरह इस मंत्र का जप करो।
 पानी में देखो इस पानी को पी जाओ,  रात को सोते समय भी ऐसा करो । ऐसा करने से चमत्कारी ईश्वरीय सहायता मिलेगी।, नशे की आदत छूट जाएगी, भाग्य बदलेगा और सुख शांति का संचार होगा। मानसिक व शारीरिक तौर पर सतर्क रहें किसी भी प्रकार का नकारात्मक भाव को मन में ना आने दे। नैगटीव विचार  एक बार मन में घुसने के बाद नकारात्मक भाव बड़ी तेजी से विकसित होते हैं।  इसलिए अपनी शक्तियों को पहचानो जो अनंत है। अपने शारीरिक व मानसिकता की तारीफ करें। अपनी उपलब्धियों को अभिवादन भी आपको फल देता है। अतः प्रेरणा मिलती है जो हमारे प्रयास दृढता को बनायें रखती है। 
अपने मन को सकारात्मक बनाए रखें, ऐसी सोच विचार से आपको सफलता, प्यार, समाधान, आशा खुशी तथा आरोगय  को बल मिलता है।
 नेगेटिव सोच विचार जिसमें असफलता, पराजय, निराशा, घृणा, रोग गरीबी तथा विपति को बढ़ावा मिलता है। हम जैसा सोचते हैं वैसा बन जाते हैं इसलिए अपने बारे में अपने प्रयासों के बारे में अपनी उपलब्धियों के बारे में हमेशा अच्छा और ऊंचा सोचे।
 प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा छिपा हुआ है, उसे प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना आवश्यक है, और हमेशा अच्छी सोच रखना। यह सोचना कि भगवान हर पल हर, समय, मेरी बात सुन रहा है, और मेरा साथ दे रहा है।
 यह एक बहुत ही चमत्कारिक टॉनिक है। सिर्फ हमारी सोच पर निर्भर करता है कि ऐसा सोचते हैं जैसा हम सोचते हैं वैसा हमारे साथ होता है यह एक हमारे अंदर की पूरी महान शक्ति है।

मानसिक शक्ति को बढ़ाना - 
हमारे अंदर एक बहुत ही बड़ी शक्ति है।  बुरे समय में संघर्षों का सामना करते समय हमारी आत्मिक शक्ति ही हमारे काम आती हैं। हमें ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु हमें शक्ति दो जीवन की बुरी परिस्थितियों और समस्याओं का सामना करने की शक्ति दो, यह सब हमारे अंदर ही हैं और हर मनुष्य के अंदर इतनी क्षमता होती है कि वह हर स्थिति का सामना कर सके । आंसू बहाने से, रो रो कर अपना दुख दर्द दूसरों को कहने से कम नहीं होता,
 बल्कि और बढ़ता है। ऐसी स्थिति और परिस्थिति के लिए अपने अंदर की शक्ति और मानसिक संतुलन को बनाए रखना है। अपने विवेक से सही मार्ग का निर्माण करें जैसे गाड़ी में ब्रेक का होना बहुत आवश्यक है। भी महंगी कयो न हो बिना ब्रेक के मार्ग तय कर पाना खतरे से खाली नहीं है। उसी तरह बिना विवेक के जीवन अर्थहीन हैं।हम मंजिल पर नहीं पहुंच सकते ।विवेक से हमें भले बुरे ए का ज्ञान होता है, क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए?  इसका ज्ञान होता है। भक्ति से हर स्थिति में गुनगुनाते, मुस्कुराते आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा प्राप्त होती है। गाना गुनगुना, मुस्कुराना नहीं भुलते हिम्मत से आगे बढ़ते रहते हैं, उनके  जीवन में कठिनाइयां तो आती है  पर वो लोग  सहज ही पार कर जाते हैं।
 दृढ़ आत्मविश्वास वाले लोग भगवान की मदद से मन के हारे हार है, मन के जीते जीत हैं।
 हम हर कार्य को जितना कठिन है, कठिन है ऐसा समझते हुए कार्य उतना ही कठिन होता है ,लेकिन हम कठिन को कठिन ना समझ कर  पुरुषार्थ करते रहे तो सफल भी हो सकते हैं। लगातार प्रयास करने वाला इंसान हजार बार असफल होने पर अपना काम चालू रखते हैं तो भगवान उसकी अवश्य ही मदद करता है।
जीवन में उत्साह का होना भी शरीर के रोगों से बचाता है किसी भी चुनौती का दृढ़ता व साहस से सामना करने की क्षमता हमारे रोगों को चुनौती देता है। कुछ स्वास्थ्य सफल लोगों का मत है कि उनके अच्छे स्वास्थ्य का राज  उनकी अच्छी आदते ही हैं। जैसे धूम्रपान ना करना, संतुलित भोजन और हल्का व्यायाम, करना ही उनके सवास्थय का टॉनिक है।  

 खुद से बात करने के लिए अपने लिए कम से कम प्रति 20 मिनट का समय निकालें और शांत चित्त होकर ध्यान (मेडिटेशन )में जरूर बैठे ताकि आप अपने बारे में सोच सकें ।
उस समय आपका मन उस अदृश्य शक्ति के साथ जो पुरे ब्रह्मांड का मालिक है और हम एक बिंदु के रूप में ही आत्मा हमारे शरीर में बसती है । इस समय हम संसार की भागदौड छोडकर प्रभू से मिलने के लिए शांत होकर अपनी अन्दर की आखों से उनहे देखने का प्रयास करे।  यह सब शुरू में थोड़ा कठिन लगता है पर धीरे-धीरे अभ्यास करने से उसकी साक्षात दर्शन होने लग जाते हैं।
Last alfaaz- 
 जीवन को अपूर्व उत्साह और तनाव को एक चुनौती के रूप में लेना भी एक मुख्य कारण है, क्योंकि हमारे  अंदर एक महान शक्ति विराजमान है।  उसकी मदद से हम अपने रोगों को खुद ठीक कर सकते हैं जिसमें किसी भी प्रकार का शंका नहीं है। हमारा स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है इसलिए खुद को पहचानो और अपनी बुरी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करो। यही जीवन का असली मन्त्र है।


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