द्रोपदी मुर्मू की अनसुनी बातें | unknown facts about dropddi murmu |



Tittle-द्रौपदी मुर्मू का जीवन परिचय -बहुत दिनों से  सोशल मीडिया पर भारत देश की 15 वी राष्ट्रपति बनने वाली द्रौपदी मुर्मू का नाम काफी चर्चा में है, और हम सभी की जानने की इच्छा भी है, द्रौपदी मुर्मू है कौन ? 
आइए जानते हैं हम इसके बारे में विस्तार से आखरी द्रौपदी मुर्मू कौन हैं और उनके जीवन की कहानी कहां से शुरू हुई और कहां पहुंच गई है। आज द्रौपदी मुर्मू हमारे देश की 15 वी राष्ट्रपति बन गई है। धन्य है वह महान आत्मा जिसने इतना त्याग और बलिदान दिया है। अब हम बता रहे हैं आपको  विस्तार से उसके जीवन परिचय के बारे में।


द्रौपदी मुर्मू का जीवन परिचय-
आदिवासी समुदाय से संबंध रखने वाली और उड़ीसा राज्य में पैदा हुई द्रौपदी मुर्मू को हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा भारत के अगले राष्ट्रपति के पद के उम्मीदवार के तौर पर चुना गया है। यही वजह है जिसके कारण सभी लोग द्रौपदी मुर्मू के बारे में जानना चाहते हैं । आज हम आपको राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की वो अनसुनी बातें  बताते हैं, जिसे सुन कर आज देश की हर महिला अपने ऊपर गौरव महसूस करेंगी और भावुक भी होगी। जो एक आम नागरिक की तरह दिन रात मेहनत करके अपने परिवार का पेट पाला और आज राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार के रूप में चुनी गई है।
जन्मस्थान -
द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के ऊपरबेड़ा गांव में एक आदिवासी परिवार में हुआ है।

द्रौपदी मुर्मू के माता-पिता का नाम, पति, बेटे, बेटी का नाम-
द्रौपदी मुर्मू आदिवासी संथाल परिवार से ताल्लुक हैं और उनके पिता का नाम बिरंची नारायण टुडू है । द्रौपदी मुर्मू का विवाह श्याम चरण मुर्मू से हुआ था।
शादी के बाद उनके दो बेटे और एक बेटी हुई । लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने पति और अपने दोनों बेटों का निधन हो गया था। उनकी बेटी इतिश्री की शादी गणेश हेम्ब्रम से हुई है ।

द्रोपदी मुर्मू ने शिक्षा कहां से ली- 
द्रौपदी मुर्मू ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने ही क्षेत्र में स्थित एक विद्यालय से प्राप्त की थी। प्रारंभिक पढ़ाई पूरी होने के बाद वह आगे की पढाई के लिए यानि ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए भुवनेश्वर शहर चली गई । उन्होंने भुवनेश्वर के रामादेवी महिला कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है। इसके बाद उन्हें ओडिशा सरकार के सिंचाई और बिजली विभाग में एक जूनियर असिस्टेंट यानी कलर्क के रूप में नौकरी मिली जो इन्होंने यह नौकरी साल 1979 से लेकर के साल 1983 तक पूरी की है। इसके बाद इन्होंने साल 1994 से 1997 तक रायरंगपुर में श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में मानद सहायक शिक्षक के रूप में काम किया है।

द्रोपदी मुर्मू का राजनीतिक सफर -
द्रौपदी मुर्मू ने साल 1997 में ओडिशा के रायरंगपुर नगर पंचायत में एक पार्षद के रूप में अपना राजनीतिक करियर शुरू किया थाऔर फिर साल 2002 से लेकर के साल 2009 तक मयूरभंज जिला भाजपा का अध्यक्ष बनने का मौका भी मिला था।
उड़ीसा गवर्नमेंट में राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के तौर पर द्रौपदी मुर्मू को साल 2000 से लेकर के साल 2004 तक ट्रांसपोर्ट और वाणिज्य डिपार्टमेंट संभालने का मौका मिला था।

इन्होंने साल 2002 से लेकर के साल 2004 तक उड़ीसा गवर्नमेंट के राज्य मंत्री के तौर पर पशुपालन और मत्स्य पालन डिपार्टमेंट को भी संभाला है।

साल 2002 से लेकर के साल 2009 तक यह भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मेंबर भी रही है।

साल 2004 में यह रायरंगपुर विधानसभा से विधायक बनने में भी कामयाब हुई और आगे बढ़ते बढ़ते साल 2015 में इन्हें झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य के राज्यपाल के पद को संभालने का भी मौका मिला ।
भारतीय जनता पार्टी के एसटी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष के पद को इन्होंने साल 2006 से लेकर के साल 2009 तक संभाला है।

एसटी मोर्चा के साथ ही साथ भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मेंबर के पद पर यह साल 2013 से लेकर के साल 2015 तक रही है।
द्रौपदी मुर्मू भारतीय जनता पार्टी की ओडिशा इकाई की अनुसूचित जनजाति मोर्चा की उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष भी रहीं है ।

उन्हें 2013 में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी  के सदस्य के रूप में भी नामित किया गया था ।

झारखंड के राज्यपाल के पद को उन्होंने साल 2015 में प्राप्त किया और यह इस पद पर साल 2021 तक विराजमान रही है।

द्रोपदी मुर्मू की परिवार की पीड़ा दायक कहानी-
वर्ष 2009 में द्रौपदी मुर्मू ने अपने 25 साल की उम्र के एक बेटे की असमय मौत हो गई थी और फिर
वर्ष 2013 में एक सड़क दुर्घटना मे उनके दूसरे बेटे की भी मृत्यु हो गई थी। सिर्फ चार वर्षों में उन्होंने एक के बाद एक अपने दोनों बेटों को खो दिया था।उसके बाद
2013 में उनके दूसरे बेटे की मृत्यु के कुछ दिन बाद अपनी  मां और अपने भाई को भी खो दिया था यानी उनकी भी मृत्यु  हो गई थी। वर्ष 2014 में द्रौपदी मुर्मू के पति श्याम चरण मुर्मू का देहांत हो गया था।

राज्यपाल बनने का गौरव- द्रौपदी मुर्मू के नाम झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनने का भी गौरव हासिल है । अगर, वह राष्ट्रपति के लिए चुनी जाती हैं तो आजादी के बाद पैदा होने वाली आदीवासी समाज से पहली राष्ट्रपति भी है। द्रौपदी मुर्मू झारखंड में सबस अधिक समय तक राज्यपाल के पद पर रहीं है।

सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए  नीलकंठ पुरस्कार मिला-
द्रौपदी मुर्मू को साल 2007 में ओडिशा विधानसभा द्वारा साल के सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । उनके पास ओडिशा सरकार में परिवहन, वाणिज्य, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसे मंत्रालयों को संभालने का अनुभव है ।

राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में कैसे शामिल हुई-
राष्ट्रपति के पिछले चुनाव में भी द्रौपदी मुर्मू का नाम प्रमुख दावेदार के रूप में उभरकर सामने आया था । इसके पीछे उनके कार्यों और उनकी सादा जीवन जीने का तर्क दिया जा रहा था और  साथ में जो उनके अंदर समाज सेवा की भावना थी उसको देखकर सबसे आगे वह इस दौड़ में शामिल थी, क्योंकि वह समाज सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहती है। 

मांसाहार पर प्रतिबंध-
द्रौपदी मुर्मू शाकाहारी हैं, वह अपने कार्यकाल में उन्होंने पूरे राजभवन में मांसाहार खाने पर प्रतिबंध लगाया था। राजभवन परिसर में रहनेवाले पदाधिकारियों व कर्मियों के आवासों में भी मांस-मछली का बनना प्रतिबंधित था।

झारखंड में राज्यपाल के तौर पर द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें अभूतपूर्व विदाई दी गई थी।  प्रदेश में झामुमो की सरकार बनने के बावजूद उन्हें यह सम्मान मिला था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने परिवार के साथ मिलकर बेहद आत्मीय तरीके से उन्हें विदा किया था।

द्रौपदी मुर्मू द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय  कदम-
झारखंड की राज्यपाल के रूप में द्रौपदी मुर्मू हमेशा यहां के आदिवासियों तथा छात्राओं के हित के लिए सजग और लगनशील रही। इसे लेकर कई बार उन्होंने राजभवन में विभिन्न विभाग के पदाधिकारियों को बुलाकर आवश्यक निर्देश दिए थे।
कुलाधिपति के रूप में भी द्रौपदी मुर्मू ने उच्च शिक्षा के विकास में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इसमें चांसलर पोर्टल शुरू करना भी इनकी बड़ी उपलब्धि थी, जिसमें सभी विश्वविद्यालयों को एक प्लेटफार्म पर लाकर एक साथ नामांकन से लेकर, निबंधन और परीक्षा के फार्म भरने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इनके कार्यकाल में विश्वविद्यालयों में होनहार और अनुभवी कुलपतियों  पदाधिकारियों की नियुक्ति हुई है।
झारखंड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में उन्होंने जमशेदपुर में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर प्रयास किए, जिसके बाद जमशेदपुर महिला कालेज को विश्वविद्यालय के रूप में अपग्रेड किया गया है।

द्रौपदी मुर्मू पहली राज्यपाल थीं, जिन्होंने कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में जाकर वहां पढ़ाई कर रहीं छात्राओं की समस्याओं को जानने का प्रयास किया है। साथ ही उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर संबंधित विभाग के पदाधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गये थे।

यह थी द्रौपदी मुर्मू की जीवन की राजनीतिक सफर की कहानी
पर वह एक महिला और मां होने के नाते एक बार अपने परिवार में होने वाली मौतो के कारण बुरी तरह टूट गई थी। ऐसा कहा जाता है कि वह इस हादसे के बाद डिप्रेशन में आ गई थी, पर उसने जिंदगी जीने के लिए हिम्मत नहीं हारी और खुद को इस दुःख से बाहर निकलने के लिए ब्रह्मकुमारी संस्था के साथ जुड़ी और खुद को संभाला है। लोगों की सेवा करने के लिए और इस दुःख से उबरने के लिए  इस संस्था से जुड गई थी। यह एक ऐसी संस्था है जब इंसान सब जगह से हार जाता है और शिव भगवान् का परिचय देने वाली इस संस्था का सहारा लेता है तो वह उसको जीने का मकसद सिखा देते हैं। आज हमारे देश की  राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू जी भी ब्रह्मकुमारी संस्था से जुड़ी हुई है। उसने खुद के लिए जीना सीखें और उस हादसे से बाहर हुई है।
आज द्रौपदी मुर्मू अपने आत्मविश्वास और भगवान शिव  के आशीर्वाद से इतने बड़े बड़े पद पर पहुंच गई है, पर उनका जीवन सादा और उच्च विचारों वाला हैं।
औम शान्ति। 

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