नैगटीव सोच कैसे खत्म करे || खुद को पोजटीव कैसे रखे || नैगटीव सोच को पोजटीव कैसे बदले ||

Tittle- नैगटीव सोच को पोजटीव कैसे करें- साइंस के अनुसार एक सिद्धांत है की नकारात्मक सोच  सकारात्मक की तुलना में अधिक प्रभावशाली है जैसे कि कहा जाता है कि बुरा अक्सर जल्दी हो जाता है अच्छा देर में होता है। यह सिद्धांत असल में स्वीकार भी किया गया है और अक्सर भावनात्मक विज्ञान में बाधा के रूप में कार्य करता है। अगर यह सच है तो रोजमर्रा की जिंदगी में किस प्रकार अपनी जिंदगी को नेगेटिव सोच से दूर रखकर खुद को पॉजिटिव रखें। आज हम इस लेख के माध्यम से आपको कुछ ऐसे सुझाव देने की कोशिश करेंगे जिससे आप अपना जीवन सुखद बना सकते हो।

जब वैज्ञानिकों ने मानवीय मस्तिष्क पर शोध किए , तो उन्हें एक मुख्य बात देखने को मिली । उन्होंने पाया कि मस्तिष्क की संरचना में अच्छी और बुरी बातों या अनुभवों को संजोने की क्षमता एक जैसी नहीं है । यानी पॉज़िटिविटी - नेगेटिविटी को लेकर उसकी बनावट symmetrical ( समान ) न होकर , asymmetrical ( असमान ) है । इसमें नकारात्मक पहलू की तरफ मस्तिष्क का झुकाव ज्यादा है । इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं ।


2 मान लीजिए आप किसी स्थान पर छुट्टियाँ मनाने गए आप बहुत घूमे फिरे । अलग - अलग स्थानों का आनंद लिया । पर एक स्थान पर नदी में तैराकी के लिए जाते समय आपका पाँव फिसल गया । आप किसी तरह डूबते - बते बचे । यदि उस समय वहाँ के कुछ लोग आपको न पकड़ते तो आपके साथ कोई अनहोनी  तय थी । अब जब आप वापिस लौटेंगे , तो आपके स्मृति पटल पर ज्यादा गहराई से क्या छपा होगा ? उस जगह के मनोहर दृश्य वा फिर पानी में डूबने की वह दुर्घटना ?

 उत्तर स्पष्ट है -

 मस्तिष्क की इस प्रवृत्ति को यानी सकारात्मक बातों की तुलना में नकारात्मक बातों को अधिक गहराई से पकड़ना- वैज्ञानिक इसे ' नेगेटिविटी ' कहते हैं । वास्तव में , यह मस्तिष्कीय प्रवृत्ति हमारे हित के लिए होती है ताकि हम भविष्य में उस भूल या दुर्घटना से ज्यादा सावधान रहें । दोबारा  उसका शिकार न बनें ।  परंतु मस्तिष्क के इस गुण को हम अपने लिए अवगुण बना लेते हैं । हम अधिकतर हर बात या परिस्थिति का नकारात्मक पहलू ही देखते हैं । दिन - भर में जिन बातों को हमें भूल कर आगे बढ़ जाना चाहिए , हम उन्हें ही बार - बार सोचते रहते हैं । उनसे सीखने की बजाय , उन्हें सोच - सोच कर परेशान होते  हैं , उदास होते हैं या फिर हीन भावना , भय , कड़वाहट जैसी भावनाओं से भर जाते हैं ।


यदि इस पर आपको तार्किकती है  कि मस्तिष्क को संरचना हो जब नकारात्मकता की तरफ है तो हम फिर क्या कर सकते हैं ?

 हम इसे एक उदाहरण से समझते हैं- एक बच्चा जब चलना सीखता है तो इस प्रक्रिया में वह बहुत बार गिरता है । अब जब यह गिरता है , उसे चोट भी लगती है , दर्द भी होता है और वह भी है फिर से चल पडता है  । पर ऐसे में उसकी माता तुरंत क्या करती है ? वह कोई खिलौना बजाकर या टॉफी इत्यादि दिखाकर उसे उठाकर फिर चलने के लिए प्रेरित करती  है । वह बच्चा गिरने का दुःखद पहलू छोड़कर , उस खिलौने या टॉफी को लेने के लिए बढ़ आगे बढ जाता है।  अब देखिए , इस पूरे घटनाक्रम में क्या हुआ ? उपरोक्त तर्क के आधार पर वह बालक नकारात्मक पक्ष को ही पकड़कर बैठा रहता । चोट लगने के कारण चलने का प्रयास ही छोड़ देता । परंतु उसकी माँ ने उसके चिंतन को तुरंत सकारात्मक दिशा में मोड़ दिया । उसे यह समझा दिया कि गिरने के बाद फिर से उठकर चलने पर खिलौना या टॉफी मिलती है । ठीक ऐसे ही उस बालक की तरह एक साधक की भी सद्गुरु रूपी भी मदद करते हैं । नकारात्मक परिस्थितियों से हारना नहीं ,बल्कि उनसे सीखकर आगे बढ़ना सिखाते हैं । इसलिए साधक के लिए आवश्यक है कि वह आंतरिक स्तर पर अपने गुरु से संपर्क बनाए रखे प्रार्थना व सुमिरन के माध्यम से उनसे जुड़ा रहे तभी वह उनके द्वारा मिलने वाले सूक्ष्म संदेशों व संकेतों को पकड़ सकता है तथा उनसे लाभ उठा सकता है ।


इसी प्रकार जिंदगी में सुख और दुख दो ऐसी बहन भाई हैं जो हमारे साथ-साथ चलते हैं कभी भी जिंदगी में किसी भी तरह की परस्थिति आने पर निराश नहीं हुई है क्योंकि यह तय है कि अंधेरा होने के बाद सुर्य उदय  हर हाल में होता है।  ऐसा कभी नहीं होता कि अंधेरा हुआ हो और सुरज ना उगा हो। इस तरह जीवन में अगर दुख आया है तो सुख भी जरूर आएगा और अगर दुख आया है उसे यह सोचकर सहन करें कि यह समय भी चला जाएगा।


अपने ऊपर कभी भी नेगेटिव सोच को हावी न होने दे क्योंकि जहां फूल है वहां कांटे भी हैं इसलिए कांटों से हम सब फूलों को हम बड़े आराम से तोड़ लेते हैं और इसी का नाम जिंदगी है। केवल निराशा में पड़े रहना  खुद को बीमार करने के सिवाय और कुछ नहीं है। अगर आप भी इस तरह की नेगेटिविटी को लेकर कभी भी परेशान हो तो खुद को पॉजिटिव रखें और इस तरह के लेख पढ़कर अपने आप को आगे बढ़ाने की कोशिश करें। ऐसे लेख पढ़ने से आपको खुद का जीवन जीने में बहुत ज्यादा प्रेरणा मिलेगी और अपनी जिंदगी को इंजॉय कर पाओगे, क्योंकि दुनिया में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसकी जिंदगी में कभी दुख ना आए हो।

निष्कर्ष- जिंदगी को मेला समझकर जियें बोझ नहीं क्योंकि एक दिन यहां से सब कुछ छोड़कर फिर वापस अपने घर जाना है। हम यहां जो कुछ भी कमाते हैं वह सब यहीं रह जाता है। 

Posted by kiran

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ